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समाचार मिर्ची

मुंबई।अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी के साथ कॉमिक तिकड़ी का रीयूनियन फिल्म ‘भूत बंगला’ में धमाकेदार साबित हुआ है। फिल्म का पहला हाफ अक्षय कुमार, परेश रावल, असरानी और राजपाल यादव की शानदार कॉमिक टाइमिंग से खूब हंसाता है। प्रियदर्शन की फिल्म में फिजिकल कॉमेडी का कमाल दिखता है, जो दर्शकों को बांधे रखता है।

दूसरे हाफ में फिल्म हॉरर मोड में जाती है, लेकिन यहां कहानी कमजोर पड़ जाती है। वधूसुर राक्षस की एंट्री के साथ प्लॉट उधड़ने लगता है। बाप-बेटे के रिश्ते जैसे कई धागे खोले जाते हैं, लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया जाता। लेखन और ट्रीटमेंट की कमी खलती है।फिल्म विजुअली ठीक है और सीजी वधूसुर तथा क्लाइमेक्स के इफेक्ट्स स्टैंडर्ड के मुताबिक अच्छे हैं। फिर भी, मजबूत मैसेज और गहराई की कमी फिल्म को प्रभावित करती है। कुल मिलाकर ‘भूत बंगला’ परिवार के साथ देखने लायक कॉमेडी है, जिसमें हॉरर हिस्सा अपेक्षाकृत कमजोर रहा।

फिल्म का पहला हाफ इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है। अक्षय कुमार की ऊर्जा और उनका कॉमिक अंदाज पहले सीन से ही दर्शकों को बांध लेता है। परेश रावल अपनी खास डायलॉग डिलीवरी और एक्सप्रेशन से फिल्म में जान डालते हैं, जबकि राजपाल यादव और असरानी की मौजूदगी हास्य का स्तर और ऊंचा कर देती है। प्रियदर्शन की खासियत रही फिजिकल कॉमेडी इस फिल्म में भी भरपूर देखने को मिलती है। कई ऐसे दृश्य हैं, जहां बिना ज्यादा संवाद के सिर्फ बॉडी लैंग्वेज और सिचुएशन के जरिए हंसी पैदा की गई है, जो दर्शकों को लंबे समय तक याद रह सकती है।

यहीं पर फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। वधूसुर राक्षस की एंट्री के साथ कहानी में कई नए ट्विस्ट लाने की कोशिश की जाती है, लेकिन ये ट्विस्ट प्रभावी नहीं बन पाते। प्लॉट में कई ऐसे पहलू जोड़े जाते हैं, जैसे बाप-बेटे का रिश्ता और उससे जुड़ी भावनात्मक परतें, लेकिन इन सबको सही तरीके से विकसित नहीं किया जाता। परिणामस्वरूप कहानी बिखरी हुई लगने लगती है।

कुल मिलाकर ‘भूत बंगला’ एक ऐसी फिल्म है, जो शानदार कॉमिक शुरुआत के बाद हॉरर और कहानी के स्तर पर कमजोर पड़ जाती है। यह फिल्म हंसी के कुछ बेहतरीन पल देती है, लेकिन एक मजबूत और यादगार अनुभव बनने से चूक जाती है। परिवार के साथ देखने के लिहाज से यह एक ठीक-ठाक मनोरंजक फिल्म कही जा सकती है, जिसमें कॉमेडी तो दमदार है, लेकिन हॉरर का असर सीमित रह जाता है।

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