नई दिल्ली। आजकल लोग सेहत को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे हैं और इसी वजह से किचन गार्डन का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। आंवला विटामिन सी, आयरन और फाइबर जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जो इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करता है। आयुर्वेद में इसे खास जगह दी गई है, क्योंकि यह बालों, स्किन और पेट की समस्याओं में राहत देता है।
आंवले का पौधा लगाने के लिए जुलाई से सितंबर का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे पौधा जल्दी जड़ पकड़ लेता है। पौधे को ऐसी जगह पर लगाना चाहिए जहां रोजाना अच्छी धूप मिलती हो, क्योंकि धूप इसकी वृद्धि के लिए आवश्यक है।
आंवला लगभग हर तरह की मिट्टी में उग जाता है, लेकिन अच्छे परिणाम के लिए दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। गमले में पौधा लगाते समय पानी निकासी की व्यवस्था जरूर रखें। मिट्टी में गोबर की खाद या वर्मीकंपोस्ट मिलाने से पौधे को जरूरी पोषण मिलता है और विकास तेज होता है।
आंवला जल्दी पाने के लिए नर्सरी से एक से दो साल पुराना तैयार पौधा लगाना बेहतर विकल्प है। इसे सीधे गमले या जमीन में रोपा जा सकता है। बीज से पौधा उगाने के लिए बीज को पानी में भिगोकर मिट्टी में बोया जाता है, जिससे कुछ समय बाद अंकुर निकल आते हैं।पौधे को जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचना चाहिए, क्योंकि जड़ों में पानी जमा होने से पौधा सड़ सकता है। गर्मियों में दो-तीन दिन के अंतराल पर पानी दें, जबकि बारिश में तभी पानी दें जब मिट्टी सूखी लगे। समय-समय पर खाद देने से पौधा स्वस्थ रहता है। ग्राफ्टेड पौधे में दो-तीन साल में फल आने लगते हैं, जबकि बीज से उगाए पौधे में इसमें अधिक समय लगता है।
आंवले का पौधा लगाने का सही समय
आंवले का पौधा लगाने के लिए जुलाई से सितंबर का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान बारिश की वजह से मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है, जिससे पौधा जल्दी जड़ पकड़ लेता है और उसकी शुरुआती वृद्धि अच्छी होती है। हालांकि, अगर आप गमले में पौधा लगा रहे हैं तो इसे साल के अन्य समय में भी उगाया जा सकता है, बस पानी और धूप का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
मिट्टी का चयन और तैयारी
आंवला लगभग हर तरह की मिट्टी में उग सकता है, लेकिन अच्छी पैदावार के लिए दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है। मिट्टी को भुरभुरी और उपजाऊ बनाने के लिए उसमें गोबर की खाद या वर्मीकंपोस्ट मिलाना चाहिए।
गमले में पौधा लगाने के लिए यह ध्यान रखें कि उसमें पानी निकासी (ड्रेनेज) की उचित व्यवस्था हो। इसके लिए गमले के नीचे छेद होना जरूरी है, ताकि अतिरिक्त पानी बाहर निकल सके और जड़ें सड़ने से बची रहें।
