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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दहेज के लिए पत्नी की हत्या के एक मामले में पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि अपनी बेटियों की शादी बचाने की माता-पिता की चिंता कई महिलाओं को मौत के जाल में धकेल रही है। वे प्रताड़ना की शिकायतों के बावजूद उन्हें ससुराल वापस भेज देते हैं।

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए सवाल उठाया, “क्या युवा सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर की वजह से सोमा को भेड़ियों के हवाले कर दिया गया?” कोर्ट ने दहेज के मामलों की बढ़ती संख्या के बीच समाज को सोचने के लिए यह सवाल उठाया।

गौरतलब हैं कि, अदालत ने पाया कि सोमा ने बार-बार अपने माता-पिता को ससुराल में हो रही प्रताड़ना की जानकारी दी थी। वह अपने मायके भी आई और कुछ दिनों तक वहां रही, लेकिन बड़ों द्वारा सुलह कराने की कोशिशों के बाद उसे वापस भेज दिया गया। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि सोमा ने बार-बार बचाने की गुहार लगाई, लेकिन हर बार समझौते और वापसी की कोशिशें की गईं।

यहां हम आपको यह बता दें कि, बेंच ने पति की आत्महत्या वाली दलील खारिज कर दी। मेडिकल और अन्य सबूतों से साफ हुआ कि सोमा को मोटरसाइकिल, टीवी और अन्य सामानों की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। उसके शरीर पर पाए गए जख्म आत्महत्या से मेल नहीं खाते और मौत से पहले हिंसा के संकेत मिले। कोर्ट ने इसे “नकली फांसी” का मामला बताया।

यह फैसला केवल एक दोषी को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। अदालत का संदेश साफ है कि यदि परिवार, समाज और स्थानीय समुदाय समय रहते महिलाओं की पीड़ा को समझें और उन्हें सुरक्षित वातावरण दें, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। महिलाओं को समझौते के लिए मजबूर करने के बजाय उन्हें न्याय और सुरक्षा दिलाने की आवश्यकता है।

सुप्रीम Court की इस टिप्पणी ने एक बार फिर देश में दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। अब देखने वाली बात होगी कि समाज और प्रशासन इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

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