भारत के ग्रामीण इलाकों में खेती अब केवल परंपरागत फसलों तक सीमित नहीं रह गई है। बढ़ती शहरीकरण, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों की लोकप्रियता ने किसानों के लिए नए अवसर खोले हैं। ऐसी ही एक सफल कहानी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से सामने आई है, जहां शरीफाबाद गांव के किसान जवाहर यादव ने विदेशी सब्जी आइसबर्ग लेट्यूस की खेती अपनाकर कम समय में तगड़ा मुनाफा कमाना शुरू कर दिया है। मात्र डेढ़ बीघा जमीन पर उन्होंने एक फसल से 90 हजार से 1 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमाया है। यह सफलता न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही है, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी एक मिसाल बन रही है कि सही फसल चयन और बाजार से जुड़ाव से खेती लाभ का बड़ा साधन बन सकती है।
आइसबर्ग लेट्यूस की खेती की सबसे बड़ी खासियत इसका कम समय में तैयार होना है। सामान्यतः यह फसल 45 से 60 दिनों में (कुछ मामलों में 50 दिन) कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह ठंडे मौसम की फसल है, इसलिए भारत में मुख्य रूप से सितंबर से फरवरी तक बुवाई की जाती है। आदर्श तापमान दिन में 15-20 डिग्री सेल्सियस और रात में 10-15 डिग्री के बीच रहना चाहिए। अधिक गर्मी में यह जल्दी बोल्टिंग (फूल आने) की समस्या का शिकार हो जाती है, इसलिए सही समय पर बुवाई जरूरी है। पॉलीहाउस या नियंत्रित वातावरण में साल भर उत्पादन संभव है, लेकिन खुले खेत में सर्दियों का मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है।
लागत और मुनाफे का गणित देखें तो यह फसल छोटे किसानों के लिए भी आकर्षक है। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, प्रति एकड़ लागत 40-50 हजार रुपये (बीज, खाद, मजदूरी आदि) तक आती है। उत्पादन 8-10 टन प्रति एकड़ तक हो सकता है। बाजार में थोक कीमत 50-170 रुपये प्रति किलो तक चलती है (क्षेत्र, मौसम और क्वालिटी के आधार पर), जबकि होटलों में इससे अधिक मिल सकती है। इससे शुद्ध मुनाफा 2-3 लाख रुपये प्रति एकड़ प्रति फसल तक पहुंच सकता है। बाराबंकी जैसे इलाकों में छोटे स्तर पर भी अच्छा रिटर्न मिल रहा है, क्योंकि लोकल मार्केट और डायरेक्ट सप्लाई आसान है।
देश में आइसबर्ग लेट्यूस की खेती अब कई राज्यों में फैल रही है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के किसान बिनवंत सिंह ने 23 साल पहले नौकरी छोड़कर इसकी खेती शुरू की और आज 80 एकड़ में उगा रहे हैं, जहां प्रति एकड़ 9 टन उत्पादन से लाखों की कमाई हो रही है। नीलगिरि क्षेत्र मैकडॉनल्ड्स जैसे ब्रांड्स के लिए प्रमुख सप्लाई सेंटर बन चुका है। भारत वैश्विक स्तर पर लेट्यूस उत्पादन में तीसरे स्थान पर है, और इसकी मांग निरंतर बढ़ रही है।
