लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह एक बड़े सियासी मुद्दे के रूप में उभर चुका है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों पर फिलहाल रोक लगाए जाने के बावजूद सवर्ण जातियों और उनके संगठनों की नाराज़गी कम होने का नाम नहीं ले रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने खास तौर पर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राजनीतिक चिंता बढ़ा दी है, जहां 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण बेहद अहम माने जा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है, लेकिन सवर्ण जातियों के संगठन का गुस्सा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है. बीजेपी के नेता कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं।
इस कड़ी में हम यह बता दें कि, यूजीसी के नए नियमों को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। कोर्ट के इस फैसले का बीजेपी के कई नेताओं ने खुले तौर पर स्वागत किया और इसे सरकार की मंशा के पक्ष में बताया। हालांकि, सियासी जानकारों का मानना है कि अदालत का यह स्टे सरकार के लिए राहत से ज्यादा एक चेतावनी है, क्योंकि अब उसे न सिर्फ कानूनी बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी जवाब देना होगा।
वही, हम आपको बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद अब सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना होगा। अगर बीजेपी सरकार यूजीसी के नए नियमों को सही ठहराती है, तो सवर्ण नाराज़गी और गहरी हो सकती है। वहीं अगर सरकार नियमों में बदलाव या पीछे हटने का संकेत देती है, तो उसे अन्य सामाजिक समूहों के असंतोष का सामना करना पड़ सकता है। यही दुविधा इस पूरे विवाद को बीजेपी के लिए ‘गले की फांस’ बना रही है।
वही इस बीच पार्टी के अंदर भी इस मुद्दे को लेकर बेचैनी है। बीजेपी के एक मौजूदा विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि पार्टी जिस तरह से अपने परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को नजरअंदाज करती दिख रही है, उससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में नाराज़गी बढ़ रही है। उनका मानना है कि यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
विपक्ष का मौका और सधा हुआ दांव
यूजीसी विवाद पर विपक्षी दल भी सक्रिय हो गए हैं। राष्ट्रीय समाज पक्ष (रासपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस मुद्दे को सोशल मीडिया और जमीनी राजनीति में भुनाने की कोशिश कर रही हैं। जहां एक तरफ बीजेपी नेता सुप्रीम कोर्ट के स्टे का श्रेय अपने दबाव को दे रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और जनविरोधी नीति के तौर पर पेश कर रहा है।
चलते चलते यह बताते चले कि, अब सवाल यह है कि, बीजेपी इस चुनौती से कैसे निपटेगी। क्या सरकार सवर्ण संगठनों से संवाद बढ़ाकर उनकी चिंताओं को दूर करेगी, या फिर कानूनी प्रक्रिया का हवाला देकर समय निकालने की कोशिश करेगी? विशेषज्ञों का मानना है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में चुनाव जीतने के लिए सामाजिक संतुलन साधना बेहद जरूरी है।
