नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में नए साल 2026 की शुरुआत बेहद चिंताजनक रही है। दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 के पहले 15 दिनों में कुल 807 लोग लापता दर्ज किए गए हैं। यानी औसतन हर रोज करीब 54 लोग बिना किसी सूचना के गायब हो रहे हैं। इनमें से सबसे अधिक संख्या महिलाओं और लड़कियों की है, जो कुल मामलों का लगभग 63 प्रतिशत है। यह आंकड़ा न केवल परिवारों में दहशत फैला रहा है, बल्कि राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है।
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, इन 807 मामलों में से 235 लोगों को अब तक ट्रेस कर लिया गया है, जबकि 572 लोग अभी भी अनट्रेस्ड हैं। वयस्कों के मामलों की बात करें तो कुल 616 वयस्क लापता हुए, जिनमें से 181 का पता चल सका—इनमें 90 पुरुष और 91 महिलाएं शामिल हैं। बाकी 435 वयस्क अभी भी लापता हैं। नाबालिगों के मामले और भी अधिक चिंताजनक हैं। कुल 191 नाबालिग लापता दर्ज हुए, जिनमें से केवल 48 को ट्रेस किया गया (29 लड़कियां और 19 लड़के), जबकि 143 नाबालिग अभी तक नहीं मिले हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है।
दिल्ली पुलिस ने इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए ट्रेसिंग के लिए विशेष टीमें गठित की हैं। कई मामलों में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग और सोशल मीडिया की मदद से लोगों को ढूंढ निकाला जाता है। लेकिन 572 अनट्रेस्ड मामलों की संख्या बताती है कि प्रयासों के बावजूद कई परिवारों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। पुलिस का कहना है कि अधिकांश मामलों में लापता व्यक्ति स्वेच्छा से घर छोड़ते हैं और बाद में संपर्क में आ जाते हैं, लेकिन नाबालिगों और महिलाओं के मामलों में हर संभव सतर्कता बरती जा रही है।
पुलिस रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की राय के अनुसार, नाबालिगों में खासतौर पर 12 से 18 वर्ष की किशोरियों के लापता होने के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह स्थिति कई तरह की आशंकाओं को जन्म देती है। सभी मामले रोजमर्रा के खो जाने या घर छोड़ने तक सीमित नहीं होते। कुछ मामलों में अपहरण, मानव तस्करी या अन्य आपराधिक गतिविधियों का भी खतरा हो सकता है। हालांकि पुलिस हर मामले की जांच अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर करती है, लेकिन आंकड़ों का बढ़ता ग्राफ यह संकेत देता है कि सतर्कता और रोकथाम के उपायों को और मजबूत करने की जरूरत है।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि लापता मामलों की जांच के लिए विशेष टीमें गठित की जाती हैं और तकनीकी संसाधनों का भी इस्तेमाल किया जाता है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, सोशल मीडिया गतिविधियां और ज़िपनेट जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को ट्रेस करने की कोशिश की जाती है। इसके बावजूद, बड़े महानगर और विशाल आबादी के कारण हर मामले को जल्दी सुलझाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
