ढाका।अगस्त 2024 में बांग्लादेश की सड़कों पर उमड़ा छात्र आंदोलन देश की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया। करीब डेढ़ दशक से सत्ता में काबिज रही प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के शासन का अंत इसी आंदोलन की परिणति माना गया। उस समय सड़कों पर उतरी युवा शक्ति को ‘नई क्रांति’ का चेहरा बताया गया और माना गया कि बांग्लादेश की राजनीति में अब नई पीढ़ी निर्णायक भूमिका निभाएगी।
आंदोलन से चुनाव तक: बदलती राजनीतिक जमीन
छात्र आंदोलन के दौरान NCP के नेताओं ने भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया था। सोशल मीडिया और विश्वविद्यालय परिसरों में उनका व्यापक समर्थन दिख रहा था।लेकिन चुनावी राजनीति आंदोलन से अलग होती है। सड़कों की ऊर्जा को वोट में बदलना आसान नहीं होता। जमीनी संगठन, बूथ प्रबंधन, संसाधन, अनुभवी नेतृत्व और गठबंधन समीकरण—इन सभी कारकों की भूमिका अहम होती है। यही वह मोड़ था जहां एनसीपी पिछड़ती नजर आई।
विशेषज्ञों के मुताबिक, NCP का सबसे बड़ा आधार शहरी शिक्षित युवा थे। ये युवा पारदर्शिता, संस्थागत सुधार और आधुनिक शासन की उम्मीद कर रहे थे।लेकिन गठबंधन के बाद पार्टी का संदेश भ्रमित दिखा। एक ओर वह खुद को सुधारवादी और आधुनिक बताती रही, वहीं दूसरी ओर जमात के साथ मंच साझा करने से उसकी विचारधारात्मक स्पष्टता पर सवाल उठे।
गौरतलब हैं कि, अगस्त 2024 की क्रांति ने बांग्लादेश की राजनीति को झकझोर दिया था। लेकिन चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सड़क की लोकप्रियता और बैलेट की सफलता अलग-अलग बातें हैं।एनसीपी का उदय जितना तेज था, उसकी चुनावी गिरावट उतनी ही चौंकाने वाली है। जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन ने उसकी छवि को प्रभावित किया या नहीं—यह बहस जारी रहेगी। लेकिन इतना तय है कि यह अनुभव बांग्लादेश की नई राजनीति के लिए एक अहम सबक बन चुका है।
अब देखना यह होगा कि क्या यह छात्र शक्ति फिर से खुद को संगठित कर पाएगी और भविष्य में एक स्थायी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरेगी, या फिर यह क्रांति केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगी।
