बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव के परिणामों ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले जन-आंदोलन के बाद पहला बड़ा संसदीय चुनाव था, जिसमें शेख हसीना की अवामी लीग सरकार गिर गई थी और अंतरिम सरकार की अगुवाई नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे थे। चुनाव आयोग के अनुसार, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भारी बहुमत हासिल किया है। पार्टी ने 299 घोषित सीटों में से 209 सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगियों के साथ कुल 212 सीटें प्राप्त हुईं, जो दो-तिहाई बहुमत से अधिक है। इससे बीएनपी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है और पार्टी के चेयरमैन तारिक रहमान प्रधानमंत्री बनने की ओर अग्रसर हैं।
पहले हिंदू विजेता हैं बीएनपी के वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र रॉय। उन्होंने ढाका-3 निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज की। गायेश्वर चंद्र रॉय बीएनपी की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं और पहले राज्य मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने कुल 99,163 वोट हासिल किए (कुछ रिपोर्टों में 98,785), जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी जमात-ए-इस्लामी के मोहम्मद शाहीनुर इस्लाम को 82,232 से 83,264 वोट मिले। अंतर लगभग 15,000 से 17,000 वोटों का रहा। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि ढाका से स्वतंत्रता के बाद पहली बार कोई हिंदू सांसद चुना गया है। गायेश्वर चंद्र रॉय केरानिगंज के निवासी हैं और बीएनपी में अल्पसंख्यक नेतृत्व के मजबूत चेहरे के रूप में जाने जाते हैं। उनकी जीत ने राजधानी में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को नई मजबूती दी है।
दूसरे हिंदू विजेता निताई रॉय चौधरी हैं, जो बीएनपी के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने मगुरा-2 संसदीय क्षेत्र से जीत हासिल की। निताई रॉय चौधरी को बीएनपी के भीतर प्रभावशाली अल्पसंख्यक नेता माना जाता है। उन्होंने 147,896 वोट (कुछ रिपोर्टों में 1,46,696 से 1,47,896) प्राप्त किए। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी जमात-ए-इस्लामी के मुस्तर्शीद बिल्लाह को 117,018 वोट मिले, जिससे अंतर 30,000 से अधिक वोटों का रहा।
तीसरे हिंदू विजेता एडवोकेट दीपेन दीवान हैं, जिन्होंने रंगमती संसदीय सीट से जीत दर्ज की। दीपेन दीवान बीएनपी के रंगमती जिला अध्यक्ष रह चुके हैं और धार्मिक मामलों के सह-सचिव भी हैं। उन्होंने कुल 201,544 वोट (कुछ शुरुआती रिपोर्टों में 31,222, लेकिन अंतिम परिणामों में उच्च संख्या) हासिल किए। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी इंडिपेंडेंट उम्मीदवार पहल चकमा (फुटबॉल प्रतीक पर) को 31,222 वोट मिले, अंतर लगभग 1,70,000 वोटों से अधिक का रहा। रंगमती चटगांव हिल ट्रैक्ट्स का हिस्सा है,
ये तीनों जीत बीएनपी के टिकट पर हुईं, जो पार्टी की रणनीति को दर्शाती हैं कि उसने अल्पसंख्यकों को महत्वपूर्ण स्थानों पर मौका दिया। कुल मिलाकर, संसद में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व कम रहा—केवल चार सदस्य (तीन हिंदू और एक अन्य आदिवासी) चुने गए। महिलाओं की संख्या भी कम रही, जहां केवल सात महिलाएं जीतीं।
हम आपको इस कड़ी में बता दें कि, इस चुनाव की सबसे चर्चित बात अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व रही है। कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें हिंदू और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल थे। इनमें से केवल चार अल्पसंख्यक उम्मीदवार जीते, और इनमें तीन हिंदू उम्मीदवार बीएनपी के टिकट पर सफल रहे। जमात-ए-इस्लामी के एकमात्र हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी खुलना-1 सीट से हार गईं। यह जीत अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर हिंदू समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है, जहां हाल के वर्षों में कुछ चुनौतियां और चिंताएं रही हैं।
बताते चले कि, यह चुनाव बांग्लादेश के भविष्य के लिए निर्णायक है। तारिक रहमान, जो 17 वर्षों के निर्वासन के बाद स्वदेश लौटे, अब प्रधानमंत्री बनने की कगार पर हैं। उन्होंने ढाका-17 और बोगुरा-6 दोनों सीटों से जीत हासिल की। बीएनपी सरकार आर्थिक सुधार, लोकतंत्र की बहाली और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे मुद्दों पर फोकस करेगी। जमात-ए-इस्लामी मुख्य विपक्ष के रूप में मजबूत भूमिका निभाएगी, लेकिन उसके कुछ बयानों पर विवाद भी रहा।
कुल मिलाकर, यह चुनाव अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आशा की किरण है। तीन हिंदू सांसदों की जीत से हिंदू समुदाय में उत्साह है और वे उम्मीद कर रहे हैं कि नई सरकार उनके अधिकारों की रक्षा करेगी। बांग्लादेश की राजनीति में यह बदलाव दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा, जहां समावेशिता और लोकतंत्र प्रमुख मुद्दे बनेंगे।
