नई दिल्ली। राजस्थान सरकार के उद्यान विभाग ने बेल वाली सब्जियों की खेती करने वाले पात्र किसानों के लिए मचान और ट्रेलिस सिस्टम लगाने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देने की योजना शुरू की है। लौकी, तोरी, खीरा, करेला और टिंडा जैसी सब्जियों की बेलें जमीन पर फैलने से फल मिट्टी के संपर्क में आकर खराब हो जाते हैं। नमी से सड़न का खतरा बढ़ता है और कीट-रोग भी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे सब्जी की गुणवत्ता और मंडी भाव प्रभावित होते हैं।
मॉडर्न मचान यानी सपोर्ट सिस्टम में लोहे के तार, बांस, खंभे और जाली की मदद से बेलों को जमीन से ऊपर चढ़ाया जाता है। योजना के तहत बांस-तार वाले ट्रेलिस सिस्टम की प्रति हेक्टेयर यूनिट लागत पर 50 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। यह राशि किसान के बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए भेजी जाती है। मचान लगने के बाद फल हवा में सीधे और चमकदार तैयार होते हैं तथा मंडी में ए-ग्रेड का बेहतर भाव मिलता है।
पारंपरिक तरीके से जमीन पर बेल फैलाने पर सिंचाई के पानी और नमी से 25 से 30 प्रतिशत फल सड़कर खराब हो जाते हैं। कीटनाशकों का छिड़काव सही से नहीं हो पाता और तुड़ाई में ज्यादा मजदूरी लगती है। मचान सिस्टम में धूप और हवा बराबर मिलने से पौधों में फूलों और फलों की संख्या में 40 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। जमीन पर खाली जगह में धनिया, पालक या मेथी जैसी छोटी सब्जियां उगाकर अतिरिक्त कमाई भी की जा सकती है।
आवेदन के लिए राजस्थान के किसानों को राज किसान साथी पोर्टल https://rajkisan.rajasthan.gov.in/ पर जाना होगा। इसके लिए खुद के नाम की खेती योग्य जमीन, जमाबंदी की ताजा नकल, जन आधार कार्ड, आधार कार्ड और बैंक खाते की पासबुक आवश्यक है। ऑनलाइन आवेदन में दिक्कत होने पर नजदीकी ई-मित्र केंद्र से फॉर्म भरवाया जा सकता है। आवेदन के बाद उद्यान विभाग की टीम मौके पर फिजिकल वेरिफिकेशन करती है। वेरिफिकेशन और ढांचा तैयार होने के बाद सब्सिडी राशि सीधे लिंक्ड बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी जाती है। योजना पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर चलती है।
क्या है मचान और ट्रेलिस सिस्टम?
मचान या ट्रेलिस सिस्टम एक तरह का सपोर्ट सिस्टम है, जिसकी मदद से बेल वाली सब्जियों के पौधों को जमीन से ऊपर चढ़ाया जाता है। इसके लिए खेत में खंभे लगाए जाते हैं और उनके ऊपर तार, बांस या जाली का ढांचा तैयार किया जाता है। बेलों को इस ढांचे पर चढ़ने के लिए सहारा दिया जाता है।
इस तकनीक में लौकी, तोरी, खीरा, करेला और टिंडा जैसी फसलों की बेलें जमीन पर फैलने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ती हैं। इससे फल मिट्टी के सीधे संपर्क में नहीं आते। खेत में पौधों के आसपास हवा का आवागमन बेहतर रहता है और फसल को धूप भी अच्छी तरह मिलती है।
सरकार की योजना में बांस और तार से तैयार किए जाने वाले ट्रेलिस सिस्टम को शामिल किया गया है। पात्र किसानों को प्रति हेक्टेयर निर्धारित यूनिट लागत पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देने का प्रावधान बताया गया है।
फसल को जमीन से ऊपर रखने के कई फायदे
मचान सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बेल और फल जमीन से ऊपर रहते हैं। पारंपरिक खेती में जब फल मिट्टी के संपर्क में रहते हैं तो नमी के कारण उनके सड़ने या खराब होने का जोखिम बढ़ सकता है। विशेष रूप से लगातार सिंचाई या बारिश के दौरान यह समस्या ज्यादा दिखाई दे सकती है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जमीन पर बेल फैलाने की स्थिति में नमी और पानी के संपर्क के कारण 25 से 30 प्रतिशत तक फल खराब होने का दावा किया जाता है। मचान सिस्टम इस तरह के नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है, क्योंकि फल सीधे मिट्टी पर नहीं टिकते।
इसके अलावा जमीन से ऊपर फसल रहने के कारण किसानों को खेत में पौधों की निगरानी करने में भी सुविधा मिल सकती है। फल और बेल आसानी से दिखाई देते हैं, जिससे कीट या रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
हालांकि किसानों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सब्सिडी की वास्तविक राशि और लाभ योजना के निर्धारित नियमों के अनुसार ही मिलेगा। इसलिए आवेदन करने से पहले आधिकारिक पोर्टल पर ताजा जानकारी और पात्रता शर्तों की जांच करना जरूरी है। सही तरीके से योजना का लाभ उठाकर किसान बेल वाली सब्जियों की खेती को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
