मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और संतुलित आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने बसंत पंचमी के अवसर पर भोजशाला परिसर में पूजा और नमाज दोनों की अनुमति देते हुए, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अलग-अलग समय तय करने का निर्देश दिया है। इस फैसले को न केवल धार बल्कि पूरे देश में धार्मिक सहअस्तित्व और संवैधानिक संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है भोजशाला विवाद
भोजशाला धार जिले की एक प्राचीन ऐतिहासिक इमारत है, जिसे राजा भोज से जोड़ा जाता है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर है, जहां बसंत पंचमी के दिन परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना होती रही है। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह एक ऐतिहासिक मस्जिद परिसर है, जहां नमाज अदा की जाती रही है। इसी को लेकर दशकों से दोनों समुदायों के बीच विवाद चला आ रहा है।
इस वर्ष बसंत पंचमी से पहले हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें पूजा और नमाज की अनुमति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे गए। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तत्काल सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून के दायरे में होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी पक्ष की आस्था को ठेस न पहुंचे, इसके लिए प्रशासनिक संतुलन और न्यायिक मार्गदर्शन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बसंत पंचमी के दिन भोजशाला परिसर में दोनों समुदायों को धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन पूजा और नमाज के समय अलग-अलग होंगे। कोर्ट ने यह जिम्मेदारी जिला प्रशासन और राज्य सरकार को सौंपी कि वे स्पष्ट टाइम-टेबल तय करें और उसकी सख्ती से पालना कराएं।
इस विवाद पर मुख्य याचिका अभी भी लंबित है, जिसमें परिसर के धार्मिक चरित्र को लेकर फैसला होना बाकी है। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ASI के वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर अंतरिम आदेश दिया था, लेकिन कोई खुदाई नहीं होने दी गई। वर्तमान आदेश केवल बसंत पंचमी के लिए अंतरिम है, जो दोनों समुदायों को उनकी परंपराओं का पालन करने का अवसर देता है।
