नई दिल्ली। होली का त्योहार भारतीय संस्कृति का सबसे रंगीन और उत्साहपूर्ण पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च (मंगलवार) को मध्यरात्रि के आसपास मनाया जाएगा, जबकि रंग वाली होली 4 मार्च (बुधवार) को खेली जाएगी। पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5:55 बजे से शुरू होकर 3 मार्च शाम 5:07 बजे तक रहेगी। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6:22 बजे से रात 8:50 बजे तक है, जो लगभग 2 घंटे 28 मिनट का है। इस दौरान भद्रा काल और अन्य ग्रह योगों का ध्यान रखा जाता है, क्योंकि इस साल चंद्र ग्रहण का भी संयोग बन रहा है, जो होलिका दहन की तिथि को प्रभावित कर सकता है।
होलिका दहन का धार्मिक महत्व
होलिका दहन का संबंध भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए उसकी बुआ होलिका ने अग्नि में बैठकर उसे जलाने की कोशिश की थी। लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई।इसी घटना की याद में हर साल होलिका दहन किया जाता है, जो यह संदेश देता है कि सत्य और भक्ति की हमेशा जीत होती है।
ये 5 लोग नहीं देखते होलिका दहन
1. नई दुल्हन (नवविवाहित महिलाएं)
लोक मान्यता के अनुसार, नई दुल्हन को अपने पहले साल में होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। कहा जाता है कि शादी के बाद पहला होली पर्व बहुत संवेदनशील माना जाता है।
इसी वजह से कई जगहों पर परंपरा है कि नई दुल्हन होली से पहले अपने मायके चली जाती है और वहां त्योहार मनाती है। माना जाता है कि इससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं पड़ता।
2. सास और बहू का साथ में होलिका दहन देखना
एक और प्रचलित मान्यता के अनुसार, सास और बहू को एक साथ खड़े होकर होलिका दहन नहीं देखना चाहिए।
कहा जाता है कि ऐसा करने से रिश्तों में खटास और मतभेद बढ़ सकते हैं। हालांकि यह पूरी तरह से एक लोक विश्वास है, लेकिन कई परिवार आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं ताकि घर में शांति बनी रहे।
3. इकलौती संतान की मां
जिन महिलाओं की केवल एक ही संतान होती है, उन्हें भी होलिका दहन देखने से बचने की सलाह दी जाती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, यह परंपरा बच्चों की सुरक्षा और लंबी उम्र की कामना से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि होलिका दहन की अग्नि बहुत शक्तिशाली होती है, इसलिए ऐसी माताएं इस अग्नि से दूर रहती हैं।
4. गर्भवती महिलाएं
कुछ मान्यताओं के अनुसार, गर्भवती महिलाओं को भी होलिका दहन की अग्नि से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
इसका कारण यह माना जाता है कि अग्नि की तीव्र ऊर्जा और धुआं गर्भस्थ शिशु के लिए उचित नहीं होता। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, लेकिन सावधानी के तौर पर कई परिवार इस नियम का पालन करते हैं।
5. नवजात शिशु और छोटे बच्चे
नवजात शिशुओं और बहुत छोटे बच्चों को भी होलिका दहन की अग्नि से दूर रखने की परंपरा है।दरअसल, आग और धुएं के कारण उनकी सेहत पर असर पड़ सकता है। इसलिए बड़े-बुजुर्ग सलाह देते हैं कि बच्चों को सुरक्षित दूरी पर रखा जाए।
चलते चलते बताते चले कि, ये मान्यताएं मुख्य रूप से लोक परंपराओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों पर आधारित हैं। हर क्षेत्र में थोड़ा भिन्न रूप हो सकता है, लेकिन मूल भावना परिवार की सुरक्षा, रिश्तों की मधुरता और अच्छाई की रक्षा की है। होलिका दहन का मुख्य उद्देश्य बुराई का नाश और अच्छाई का उत्सव है। लोग इस दिन होलिका में पुरानी कटुता, नफरत और नकारात्मकता को जलाकर नई शुरुआत करते हैं।होलिका दहन के दौरान सुरक्षा के नियम भी महत्वपूर्ण हैं। प्लास्टिक, रबर या हानिकारक वस्तुएं नहीं जलानी चाहिए। शाकाहारी भोजन करना चाहिए, झगड़े से बचना चाहिए और शांतिपूर्ण तरीके से उत्सव मनाना चाहिए। इस साल चंद्र ग्रहण के कारण कुछ क्षेत्रों में सावधानियां बरती जा रही हैं।
