नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को उस समय बड़ा झटका दिया, जब उसने उनके खिलाफ चल रही इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट और महाभियोग कार्यवाही की सिफारिश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह फैसला उस वक्त आया जब वर्मा ने दावा किया कि उनके खिलाफ की गई जांच और उससे संबंधित सिफारिशें असंवैधानिक हैं और न्यायपालिका की निष्पक्षता के विपरीत हैं।
बता दें कि, जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में दावा किया था कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया असंवैधानिक है और यह संसद के विशेषाधिकार को कमजोर करती है, क्योंकि जजों को हटाने का अधिकार केवल संसद को है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 124 और 218 में कहा गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि कमेटी ने उन्हें उचित सुनवाई का मौका नहीं दिया और सबूतों की अनदेखी की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इन-हाउस प्रक्रिया को पहले के फैसलों में वैध ठहराया जा चुका है।
क्या था मामला?
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ कुछ गंभीर आरोप लगे थे, जिसके बाद तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक इन-हाउस जांच समिति गठित की गई थी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने की थी। जांच के बाद, समिति ने पाया कि न्यायमूर्ति वर्मा का आचरण एक न्यायाधीश के पद के अनुकूल नहीं है और उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर दिखाता है कि भारत की न्यायपालिका अपने आंतरिक संस्थानों को सशक्त और पारदर्शी बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इस मामले में न केवल न्यायपालिका की स्वायत्तता, बल्कि उसका संवैधानिक दायित्व भी सामने आता है — कि वह अपने भीतर मौजूद किसी भी अनुचित आचरण पर कठोर कार्रवाई करे, चाहे वह कितना भी उच्च पदस्थ व्यक्ति क्यों न हो।