नई दिल्ली। केसर बाजार में ऊंची कीमतों पर बिकने वाला मसाला अब कश्मीर की ठंडी वादियों तक सीमित नहीं रहा है। आधुनिक तकनीकों के सहारे किसान अपने इलाके के खुले खेतों में भी इसकी सफल खेती कर सकते हैं। शेड नेट हाउस जैसी व्यवस्थाओं से कश्मीर जैसा उपयुक्त तापमान और माहौल तैयार किया जा सकता है, जिससे केसर के पौधे अच्छी तरह विकसित होते हैं।
केसर की खेती पारंपरिक तरीके से थोड़ी अलग होती है। इसके लिए कश्मीरी केसर के बीज यानी कॉर्म्स की जरूरत पड़ती है। इन्हें अगस्त-सितंबर महीने में खेत में या ट्रे में लगाया जाता है। खेत की जमीन ऐसी होनी चाहिए जहां पानी न रुके, क्योंकि अधिक नमी से बीज सड़ जाते हैं। अक्टूबर से दिसंबर तक बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं, जिनमें से लाल केसर के धागे निकलते हैं। इस फसल को ज्यादा पानी या महंगी खादों की आवश्यकता नहीं होती।
केसर को दुनिया का सबसे महंगा मसाला माना जाता है। बाजार में इसकी कीमत ढाई लाख से तीन लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंचती है। छोटे क्षेत्र में भी इसकी खेती से अन्य फसलों की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफा हो सकता है। हार्वेस्टिंग में मेहनत लगती है, लेकिन फायदे इसे पूरा कर देते हैं। एक बार लगाए गए बीज हर साल खुद-ब-खुद बढ़ते जाते हैं, जिससे अगले साल बीज का खर्च बच जाता है।
कॉर्म्स से होती है केसर की खेती
केसर की खेती सामान्य फसलों की तरह बीज से नहीं होती। इसके लिए विशेष प्रकार के कंदनुमा बीज, जिन्हें कॉर्म्स (Corms) कहा जाता है, का उपयोग किया जाता है। उच्च गुणवत्ता वाले कश्मीरी कॉर्म्स का चयन बेहतर उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इन कॉर्म्स की रोपाई सामान्यतः अगस्त और सितंबर के महीनों में की जाती है। किसान इन्हें सीधे खेत में या आवश्यकता के अनुसार ट्रे अथवा नियंत्रित माध्यम में भी लगा सकते हैं। रोपाई के समय उचित दूरी बनाए रखना और स्वस्थ कॉर्म्स का चयन करना उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन किसानों के पास सीमित भूमि है और वे अधिक मूल्य वाली फसल की तलाश में हैं, उनके लिए केसर एक संभावनाओं से भरी फसल साबित हो सकती है। हालांकि इसकी खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों या उद्यान विभाग से तकनीकी सलाह लेना, प्रमाणित कॉर्म्स का उपयोग करना और अपने क्षेत्र की जलवायु व मिट्टी की उपयुक्तता का आकलन करना जरूरी है।
