नई दिल्ली।किसानों के लिए चेतावनी जारी की गई है कि लौकी और तरोई की फसलों पर भूरी रोग तेजी से फैल रहा है। कृषि विशेषज्ञों ने समय पर बचाव के उपाय करने की सलाह दी है।कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम के अनुसार भूरी रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो विशेष रूप से कद्दू वर्गीय फसलों को प्रभावित करती है। इस रोग की शुरुआत पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के छोटे-छोटे धब्बों से होती है।
क्या है भूरी रोग?
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम के अनुसार भूरी रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से लौकी, तरोई, कद्दू, खीरा, करेला और अन्य कद्दू वर्गीय फसलों को प्रभावित करती है। इस रोग को कई क्षेत्रों में पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) के नाम से भी जाना जाता है।
इस बीमारी की शुरुआत पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के छोटे-छोटे धब्बों से होती है। शुरुआती अवस्था में ऐसा प्रतीत होता है जैसे पत्तियों पर सफेद पाउडर या राख छिड़क दी गई हो। कई किसान इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।
उत्पादन पर पड़ता है सीधा असर
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि भूरी रोग केवल पत्तियों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि पूरी फसल की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। रोग के कारण पौधों की बढ़वार कमजोर हो जाती है, जिससे फल कम संख्या में लगते हैं और उनका आकार भी छोटा रह जाता है।
यदि संक्रमण लंबे समय तक बना रहे तो किसान की लागत बढ़ जाती है जबकि उत्पादन घट जाता है। इससे किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए रोग की रोकथाम और समय पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।
अंत में बताते चले कि, लौकी और तरोई की खेती करने वाले किसानों के लिए भूरी रोग एक गंभीर चुनौती बन सकता है। यह फफूंद जनित बीमारी तेजी से फैलकर फसल की वृद्धि और उत्पादन दोनों को प्रभावित करती है। कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने किसानों को नियमित निगरानी, खेत की स्वच्छता, उचित दूरी बनाए रखने और समय पर नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी है। जागरूकता और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से किसान अपनी फसलों को इस रोग से बचाकर बेहतर उत्पादन और अधिक आय सुनिश्चित कर सकते हैं।
