नकटीगांव। नकटीगांव से लौटने के बाद सोमवार की रात जब भी आंखें बंद करता, सामने वही रोते हुए चेहरे, चीखते बच्चे, टूटते हुए घर, बिखरा हुआ सामान और बेबस खड़े लोगो का दृश्य आता।जितनी बार सोने की कोशिश की, उतनी बार वही तस्वीरें आंखों के सामने घूमती रहीं। पूरी रात यूं ही गुजर गई। सुबह उठकर मैंने अपनी खबर सबमिट की।
कवरेज के दौरान हम कुछ घंटों के लिए वहां मौजूद थे लेकिन लेकिन उस मंजर को देखकर मेरी रात की नींद उड़ गई। लेकिन उन 80 परिवारों की रात कैसी बीती होगी, जिनके सिर से उनका आशियाना छिन गया? वे बच्चे जिन्होंने घर को टूटते देखा, उन बुजुर्गों ने जीवनभर की जमापूंजी मलबे में बदलते देखी, उनके दिल पर क्या गुजरी होगी, उनकी रात कैसे बीती होगी इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
कई बार नौकरी छोड़ने का मन करता है, लेकिन पता नहीं कि उसके बाद क्या करूंगा। मैं अपनी पसंद, अपनी पहचान और अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर बहुत कनफ्यूज्ड रहता हूं।बाहर से देखने पर मेरी जिंदगी ठीक-ठाक लगती है, लेकिन अंदर से मैं बहुत उलझन महसूस करता हूं। बचपन से ही मैंने वही किया, जो परिवार और समाज को सही लगा। अच्छे नंबर लाए, इंजीनियरिंग की, फिर नौकरी शुरू कर दी। लेकिन अब मुझे लगता है कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं कि मैं खुद क्या चाहता हूं।
