सीधी। धान की रोपाई के बाद किसानों को फसल को जड़ सड़न से बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कई बार पौधों की जड़ें पीली या भूरी पड़ने लगती हैं, जिससे बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन प्रभावित होता है। कृषि सलाहकार चंद्रभूषण पांडे के अनुसार, इसका मुख्य कारण खेत में लंबे समय तक पानी का जमा रहना है, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।जिंक और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्वों की कमी तथा फ्यूजेरियम और राइजोक्टोनिया जैसे फफूंद भी जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। संक्रमण बढ़ने पर जड़ें काली होकर सड़ने लगती हैं। ऐसे में सबसे पहले खेत से अतिरिक्त पानी निकाल दें, जिससे नई सफेद जड़ों का विकास होता है।
यहां यह जानकारी देते चले कि, कृषि सलाहकार अवनीश पटेल ने बताया कि खैरा रोग से बचाव के लिए रोपाई के समय प्रति एकड़ 10 से 12 किलो जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करें। नाइट्रोजन और पोटाश की संतुलित मात्रा दें। जैविक उपायों में ट्राइकोडर्मा से जड़ों का उपचार, गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा मिलाकर डालना, जीवामृत और वेस्ट डीकंपोजर उपयोगी हैं संक्रमण ज्यादा होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से कार्बेन्डाजिम + मैंकोजेब, हेक्साकोनाजोल या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का प्रयोग किया जा सकता है। फसल चक्र, गहरी जुताई, बीज शोधन और संतुलित पानी-उर्वरक उपयोग जड़ सड़न से बचाव के प्रभावी उपाय हैं।
क्यों पीली और भूरी पड़ जाती हैं धान की जड़ें?
कृषि सलाहकार चंद्रभूषण पांडे के अनुसार, धान की जड़ों के पीले या भूरे पड़ने का सबसे बड़ा कारण खेत में लंबे समय तक पानी का जमा रहना है। लगातार जलभराव की स्थिति में मिट्टी के भीतर ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे जड़ों का सामान्य विकास प्रभावित होता है।
जब जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वे धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। शुरुआत में उनका रंग पीला या हल्का भूरा दिखाई देता है और यदि समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो जड़ें काली होकर सड़ने लगती हैं। इसका असर पौधे की पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता पर पड़ता है, जिससे पौधों की वृद्धि रुक सकती है।
आखिर में बताते चले कि, धान की जड़ें यदि पीली, भूरी या काली दिखाई दें तो इसे सामान्य समस्या मानकर अनदेखा न करें। समय पर जल निकासी, संतुलित पोषक तत्वों की आपूर्ति और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उचित प्रबंधन अपनाकर फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
