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तेलंगाना में एक मंच पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने फिर से अपनी चिर-परिचित अंदाज में एक बार फिर अपने बयान से सभी का ध्यान खिंचा है। इस बार निशाना था देश का सामाजिक ढांचा और शिक्षा प्रणाली, लेकिन ट्विस्ट था भाषा का। राहुल गांधी ने कहा कि भारत में सफलता का सबसे बड़ा ‘पासवर्ड’ अंग्रेजी है। जी हाँ, वही अंग्रेजी, जिसके पीछे महाराष्ट्र में मराठी मराठों की ‘शिव-सेना’ (शाब्दिक, नहीं राजनीतिक!) और बीजेपी वाले ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ का नारा लेकर दौड़ रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी बोले, “अंग्रेजी नहीं तो कुछ नहीं।” उनका मानना है कि अगर गरीब, वंचित और पिछड़े वर्गों को अंग्रेजी की चाबी नहीं दी, तो वो वैश्विक दुनिया के ताले कैसे खोलेंगे?

वहीं, मंच पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी समाज की प्रगति का ‘त्रिदेव फॉर्मूला’ दिया – आर्थिक मजबूती, मानवीय मजबूती, और मानसिक मजबूती। और इन सबके लिए जरूरी है – अंग्रेजी। खरगे ने तो साफ कह दिया, “बिना अंग्रेजी के तो भैया, ग्लोबल गाड़ी में ब्रेक लग जाएगा।”

जब मंच राजनीतिक हो तो राहुल गांधी भी बीजेपी पर तंज कसने का मौका कैसे छोड़ सकते थे। बोले, “बीजेपी वाले अंग्रेजी को ‘विदेशी’ बताकर हाय-तौबा मचाते हैं, लेकिन उनके बच्चे तो अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में ‘हाय-हैलो’ कर रहे हैं। फिर गरीब का बच्चा हिंदी-मराठी में ही क्यों अटके?” सवाल तीखा था, वहीं अब लग कह रहे हैं कि बीजेपी की खामोशी से लगता है कि वो ऐसे सवालों से बच रही है।

दरअसल, ये भाषाई जंग नई नहीं है। एक तरफ महाराष्ट्र में मराठी का झंडा बुलंद करने की जिद है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी अंग्रेजी को ‘सक्सेस का सुपरपावर’ बता रहे हैं। बीच में फंसी जनता सोच रही है – “भाई, मराठी में सपने देखें या अंग्रेजी में जॉब पक्की करें?” क्या अंग्रेजी वाकई वैश्विक दुनिया का ‘लक्‍की चार्म’ है, या मराठी-हिंदी जैसे देसी रंगों में ही भारत की असली ताकत छुपी है? आपको क्या लगता है आप भी अपनी राय हमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से दे सकते हैं।

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