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नई दिल्लीबारिश का मौसम फसलों के लिए फायदेमंद होता है लेकिन लगातार नमी और खेतों में जमा पानी फसलों में बीमारियों के तेजी से फैलने का कारण बनता है। शुरुआती दौर में पत्तियों पर छोटे धब्बे या रंग बदलने जैसी समस्याएं पूरी फसल को प्रभावित कर सकती हैं। समय रहते संकेतों को पहचानकर नुकसान को रोका जा सकता है।

इस कड़ी मे यह जानना अतति आवश्बायक है कि, बारिश के बाद फंगल रोगों का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे, तनों का गलना, जड़ों में सड़न और पौधों का अचानक मुरझाना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। इन संकेतों को नजरअंदाज करने से बीमारी पूरे खेत में तेजी से फैल जाती है। हर दो-तीन दिन में खेत का निरीक्षण करना जरूरी है।

यहां हम आपको बताते चले कि, बीमारी के लक्षण दिखने वाले पौधों को बाकी फसल से अलग रखें। खेत में लंबे समय तक पानी जमा न होने दें। कृषि विशेषज्ञ की सलाह से फफूंदनाशी दवाओं का छिड़काव करें। पानी की निकासी का इंतजाम करें, तय सीमा में खाद का इस्तेमाल करें और खरपतवार साफ रखें। दवा का छिड़काव मौसम साफ रहने पर करें।लगातार बारिश की स्थिति में पहले से बचाव के उपाय अपनाएं। समय-समय पर कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह लें। इन तरीकों से किसान फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं।

बारिश के बाद क्यों बढ़ता है रोगों का खतरा?

बारिश के दौरान वातावरण में नमी का स्तर काफी बढ़ जाता है। यदि खेतों में पानी की निकासी सही तरीके से नहीं हो पाती, तो लंबे समय तक बनी नमी फफूंद के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। ऐसी स्थिति में कवक तेजी से फैलता है और एक पौधे से दूसरे पौधे तक संक्रमण पहुंच सकता है।

धान, मक्का, सोयाबीन, मूंग, उड़द, सब्जियों और अन्य खरीफ फसलों में इस मौसम में फंगल संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत अधिक रहता है। इसलिए किसानों को मौसम में बदलाव के साथ अपनी फसल की निगरानी भी बढ़ानी चाहिए।

कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करें फफूंदनाशी का प्रयोग

यदि रोग के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगें, तो किसानों को स्वयं दवा चुनने के बजाय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की सलाह लेकर उपयुक्त फफूंदनाशी (Fungicide) का छिड़काव करना चाहिए।

दवा का उपयोग हमेशा निर्धारित मात्रा और सही समय पर करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक मात्रा में रसायनों का प्रयोग करने से फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।

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