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नई दिल्ली। पारंपरिक फसलों से थक चुके किसानों के लिए शतावरी की खेती एक बेहतर विकल्प बन रही है। इस औषधीय पौधे को एक बार लगाने के बाद 18 महीने में एक एकड़ जमीन से 5 से 6 लाख रुपये तक का मुनाफा कमाया जा सकता है।

शतावरी की खेती आसान है और इसमें नाममात्र की लागत आती है। नर्सरी में पौधे तैयार कर खेतों में मेढ़ बनाकर लगाए जाते हैं। इस फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए कम सिंचाई वाले इलाकों के लिए भी यह उपयुक्त है। पौधे लगाने के बाद थोड़े मैनेजमेंट के साथ 18 महीने में जड़ें पककर तैयार हो जाती हैं।

जानकापी दे दे कि, इन जड़ों को खोदकर निकालकर सुखाया जाता है या पाउडर बनाकर बेचा जाता है। आयुर्वेद और मेडिकल इंडस्ट्री में इसकी अच्छी डिमांड है। डाबर और पतंजलि जैसी कंपनियां सीधे खेतों से अच्छे दामों पर खरीदती हैं। शुरुआती खर्च पहली ही हार्वेस्टिंग में वसूल हो जाता है।इस फसल पर आवारा पशुओं या नीलगाय का कोई खतरा नहीं होता क्योंकि वे इसे नहीं खाते। इससे फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है। बढ़ती मांग के कारण किसान शतावरी की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

औषधीय फसल के रूप में बढ़ रही है शतावरी की मांग

शतावरी को आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता है। इसकी जड़ों का उपयोग कई प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं, हेल्थ सप्लीमेंट्स और हर्बल उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और प्राकृतिक औषधियों की मांग के कारण बाजार में इसकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।

इस कड़ी में बता दे कि, हर्बल और आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कई कंपनियां शतावरी की जड़ों की खरीद करती हैं। किसानों के अनुसार, बाजार में मांग अच्छी होने के कारण इसकी बिक्री में आमतौर पर अधिक परेशानी नहीं होती। हालांकि, किसानों को किसी भी कंपनी या खरीदार से अनुबंध करने से पहले कीमत, गुणवत्ता मानकों और खरीद की शर्तों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए।

कम लागत और आसान खेती

शतावरी की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शुरुआती लागत अपेक्षाकृत कम होती है। इसकी खेती के लिए पहले नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके बाद खेत में मेढ़ या कतारें बनाकर पौधों की रोपाई की जाती है।

फसल की अच्छी वृद्धि के लिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था और भुरभुरी मिट्टी लाभदायक मानी जाती है। रोपाई के बाद नियमित निराई-गुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण और आवश्यक पोषण प्रबंधन करने से पौधों का विकास बेहतर होता है।

चलते चलते बता दे कि, देश में औषधीय फसलों की बढ़ती मांग के बीच शतावरी की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक संभावित विकल्प बनकर उभर रही है। कम पानी, अपेक्षाकृत कम लागत और औषधीय उपयोग के कारण यह फसल कई क्षेत्रों में लोकप्रिय हो रही है। हालांकि, 5 से 6 लाख रुपये तक के संभावित मुनाफे जैसे आंकड़े उत्पादन, गुणवत्ता, बाजार भाव, खेती की लागत और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। इसलिए किसान खेती शुरू करने से पहले पूरी जानकारी प्राप्त करें और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही निवेश का निर्णय लें। सही तकनीक, बेहतर प्रबंधन और उचित विपणन रणनीति के साथ शतावरी की खेती पारंपरिक फसलों के साथ एक लाभकारी विकल्प साबित हो सकती है।

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