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नई दिल्ली।बदलते मौसम और पानी की किल्लत के बीच धान की खेती पर निर्भर रहना किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। धान में पानी की खपत बहुत अधिक होती है, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। ऐसे में किसान कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर अपनी पैदावार और कमाई बढ़ा सकते हैं।

इन फसलों में पहला विकल्प बाजरा है। मोटे अनाजों में शामिल बाजरा कम पानी और सूखी मिट्टी में आसानी से उगता है। इसकी खेती में लागत कम आती है और बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है, जिससे अच्छे दाम मिल रहे हैं।

दूसरा विकल्प मूंग की खेती है। यह फसल करीब 60-65 दिनों में तैयार हो जाती है और बहुत कम सिंचाई की जरूरत होती है। यह मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है तथा धान की तुलना में आधी मेहनत और पानी में तैयार होती है।

तीसरा विकल्प तिलहन फसलें जैसे सरसों या सूरजमुखी हैं। सूरजमुखी विभिन्न मौसमों में ढल जाती है और कम पानी में उगाई जा सकती है। इसके बीजों से निकलने वाले तेल की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। चौथा विकल्प मक्का है, जिसे धान से कम पानी में उगाया जा सकता है और साल में कई बार बोया जा सकता है। पोल्ट्री फीड और फूड इंडस्ट्री में इसकी अच्छी मांग है।

पांचवां विकल्प अरहर यानी तुअर दाल की खेती है। इसकी जड़ें गहरी जाती हैं, जो जमीन की नमी सोख लेती हैं। इसमें अतिरिक्त पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती और दालों के बढ़ते दामों के कारण अच्छी कमाई होती है।

धान की खेती क्यों बन रही है चुनौती?

धान की खेती के लिए खेत में लंबे समय तक पानी बनाए रखना पड़ता है। यही कारण है कि इस फसल में सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है। जिन क्षेत्रों में वर्षा सामान्य से कम होती है या सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां धान की खेती किसानों के लिए महंगी साबित हो सकती है।

इसके अलावा अधिक जल दोहन के कारण कई इलाकों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में जल संरक्षण को बढ़ावा देने और कम पानी वाली फसलों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।

फसल विविधीकरण से मिल सकते हैं कई लाभ

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार केवल एक ही फसल पर निर्भर रहने की बजाय फसल विविधीकरण (Crop Diversification) अपनाना किसानों के लिए अधिक लाभकारी हो सकता है। इससे जल संरक्षण के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और जोखिम कम करने में भी मदद मिलती है।

कम पानी वाली फसलों को अपनाने से सिंचाई की लागत घट सकती है और सीमित जल संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है। साथ ही अलग-अलग फसलों की खेती किसानों को बाजार के अनुसार आय के विभिन्न अवसर भी उपलब्ध करा सकती है।

सही योजना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल का चयन करके किसान उत्पादन और आय दोनों में सुधार कर सकते हैं। कम पानी वाली फसलों की खेती न केवल जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, बल्कि भविष्य की टिकाऊ और संतुलित कृषि व्यवस्था को भी मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

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