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समाचार मिर्ची

लखनऊ। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए नए सामाजिक समीकरण की तलाश तेज कर दी है। उन्होंने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर से संपर्क कर सहयोग मांगा है, ताकि नए सामाजिक समीकरणों पर काम किया जा सके। सूत्रों के अनुसार अखिलेश यादव ने प्रशांत किशोर से फोन पर बात कर उत्तर प्रदेश में साथ काम करने की संभावनाओं पर चर्चा की है। प्रारंभिक बातचीत सकारात्मक मानी जा रही है।

यहां यह जानना आवश्यकहैं कि, डीए की नई परिभाषा गढ़ने के बाद इसे सिर्फ चुनावी मशवरा लेने की कोशिश नहीं, बल्कि नया नैरेटिव तैयार करने की कवायद माना जा रहा है। बांकीपुर में भाजपा के अपराजेय गढ़ को ध्वस्त कर प्रशांत किशोर ने जिस तरह का चुनावी मॉडल पेश किया है, उसने विपक्षी दलों का ध्यान खींचा है। उन्होंने चुनाव को केवल जातीय गणित तक सीमित नहीं रहने दिया। रोजगार, शिक्षा, स्थानीय विकास, भ्रष्टाचार और बेहतर जनप्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को उभारकर ऐसा माहौल बनाया, जिसमें भाजपा का परंपरागत ध्रुवीकरण कमजोर पड़ गया।

यहां हम आपको यह बता दें कि, बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले कुछ चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल परंपरागत वोट बैंक के भरोसे सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं रह गया है। राजद को मुस्लिम-यादव समीकरण तक सीमित रहने की कीमत चुकानी पड़ी है। विधानसभा चुनाव से पहले राजद के 77 विधायक थे, जो अब घटकर 25 रह गए। तेजस्वी यादव के इस हश्र से सबक लेते हुए अखिलेश अपने आधार का विस्तार करना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने पीडीए की परिभाषा में पंडित को शामिल किया। उनकी नजर सवर्ण वोटरों पर भी है। जनेश्वर मिश्र की जयंती को बड़े स्तर पर मनाना भी इसी रणनीति का संकेत है।

आखिर में इस कड़ी में हम आपको बता दें कि, उत्तर प्रदेश में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करना नहीं है। 2024 के बाद के राजनीतिक माहौल में उसे युवाओं, शहरी मध्यवर्ग, पहली बार मतदान करने वाले वोटरों एवं सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनानी होगी। इसके लिए जातीय गठजोड़ के साथ-साथ ऐसा विमर्श भी तैयार करना होगा जो भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा सके। कुछ महीने पहले तक अखिलेश चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका को लेकर अलग राय रखते थे। बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद उन्होंने प्रशांत किशोर की पूर्व कंपनी आईपैक की सेवाएं लेने से इनकार कर दिया था। तब सपा बाहरी रणनीतिकारों के बजाय अपने संगठन के दम पर चुनाव लड़ने पर विचार कर रही थी, मगर बांकीपुर के नतीजों के बाद परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं।प्रशांत किशोर का राजनीतिक अनुभव भी अब पहले जैसा नहीं माना जाता। 2017 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ उनका प्रयोग सफल नहीं रहा था, मगर उसके बाद उन्होंने बिहार में लंबी पदयात्रा, संगठन निर्माण और प्रत्यक्ष राजनीति के जरिए नया अनुभव अर्जित किया। बांकीपुर की जीत ने इस धारणा को भी मजबूत किया है कि अब उन्हें चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि जमीन पर चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले विशेषज्ञ नेता के रूप में भी देखा जाने लगा है।

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