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नई दिल्ली। हिंदू धर्म की समृद्ध परंपराओं में बसंत पंचमी एक ऐसा पावन पर्व है जो ज्ञान, विद्या, कला, संगीत और बुद्धि की देवी मां सरस्वती को समर्पित है। यह त्योहार न केवल वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा, उल्लास और सकारात्मकता का संचार भी करता है। प्रकृति में जब ठंड कम होकर गर्माहट फैलती है, सरसों के पीले फूल चारों ओर खिल उठते हैं और वातावरण में मधुर सुगंध भर जाती है, तब बसंत पंचमी का उत्साह दोगुना हो जाता है। पीला रंग इस पर्व का मुख्य प्रतीक माना जाता है, जो नवजीवन, समृद्धि, ज्ञान की ज्योति और आनंद का प्रतिनिधित्व करता है।

बसंत पंचमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहन है। पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि की प्रारंभिक अवस्था में संसार पूर्णतः नीरस, शांत और मौन था। भगवान ब्रह्मा सृष्टि रचना से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उसमें वाणी, ध्वनि, ज्ञान और कला का अभाव था। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक दिव्य और अद्भुत शक्ति प्रकट हुई – मां सरस्वती। सफेद वस्त्र धारण किए, हाथ में वीणा लिए, श्वेत हंस पर विराजमान मां सरस्वती ने वीणा के मधुर स्वरों से संसार को वाणी, संगीत, ज्ञान और सृजनात्मकता प्रदान की। इसी दिव्य प्राकट्य के कारण इस दिन को मां सरस्वती का जन्मदिन या प्राकट्य दिवस माना जाता है। पूजा करने से अज्ञान का नाश होता है, बुद्धि में तेजी आती है, विवेक बढ़ता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

सरस्वती स्तोत्र, वंदना या सरस्वती चालीसा का पाठ करें। प्रसाद में पीली मिठाइयां जैसे केसर हलवा, बेसन के लड्डू, पीले चावल (हल्दी-चावल) चढ़ाएं। पूजा के अंत में आरती उतारें और प्रसाद वितरित करें। कई परिवारों में इस दिन बच्चों को नई किताब छूवाने या पढ़ाई शुरू करने की परंपरा है। स्कूलों और कॉलेजों में सामूहिक पूजा आयोजित की जाती है, जहां छात्र मां सरस्वती से सफलता की कामना करते हैं।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बसंत पंचमी अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। उत्तर भारत में पीले वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है, जबकि पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में बड़े स्तर पर सरस्वती पूजा आयोजित होती है, जहां पंडाल सजाए जाते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। दक्षिण भारत में यह विद्या आरंभ का प्रमुख अवसर है। नेपाल में ‘हाते खोरी’ संस्कार होता है, जहां बच्चे पहला अक्षर लिखते हैं।

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