नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया में सामने आए भारी संख्या में दावों और आपत्तियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अनुमति दी है कि वे पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से समकक्ष रैंक के न्यायिक अधिकारियों को बुला सकते हैं ताकि लगभग 80 लाख क्लेम और आपत्तियों का समयबद्ध तरीके से निपटारा किया जा सके। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि इन अतिरिक्त न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से जुड़ा पूरा खर्च, जिसमें यात्रा, मानदेय और अन्य व्यय शामिल हैं, चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) उठाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के 22 फरवरी के पत्र पर गंभीरता से विचार किया। इस पत्र में बताया गया था कि SIR प्रक्रिया के अंतिम चरण में दावों और आपत्तियों की जांच के लिए राज्य के 250 जिला न्यायाधीशों (District Judges) और अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों (ADJ) को पहले ही तैनात किया जा चुका है।
यहां यह जानना आवश्यक हैं कि, स फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चुनाव आयोग को दिया गया निर्देश है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि झारखंड और ओडिशा से बुलाए जाने वाले न्यायिक अधिकारियों के यात्रा व्यय, मानदेय और अन्य सभी खर्च चुनाव आयोग वहन करेगा। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि SIR प्रक्रिया चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और राज्य सरकार के साथ चल रही खींचतान के कारण स्थिति जटिल हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस मामले में असाधारण शक्तियों (Article 142) का प्रयोग करते हुए मौजूदा और पूर्व जिला जजों को तैनात करने का निर्देश दिया था, जो एक दुर्लभ कदम था।
वही, यह फैसला पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना है, जिसमें पुराने, दोहरे या फर्जी नामों को हटाना और योग्य मतदाताओं को शामिल करना शामिल है। लेकिन राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी और सहयोग न करने के आरोपों के कारण यह प्रक्रिया विवादास्पद हो गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से SIR प्रक्रिया तेजी से पूरी होगी और 28 फरवरी की समयसीमा का पालन संभव हो सकेगा। हालांकि, राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच जारी मतभेदों को देखते हुए आगे की सुनवाई में और स्पष्ट निर्देश दिए जा सकते हैं। फिलहाल, यह फैसला लोकतंत्र की मजबूती और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
