नई दिल्ली।आजकल खेती में केमिकल खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। इससे खेत की उपजाऊ मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और इन रसायनों से उगाई गई फसलें स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रही हैं। इसी कारण किसान प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं।अगर खेत की मिट्टी में फिर से जान फूंकनी है और महंगी यूरिया या डीएपी खरीदने की फिजूलखर्ची से बचना है तो देसी खाद एक बेहतर विकल्प है। इसे बनाने के लिए बाजार से कुछ खरीदने की जरूरत नहीं। घर और खेत की बेकार चीजों से ही यह खाद तैयार की जा सकती है।
गोबर और सूखे पत्तों से ऑर्गेनिक कंपोस्ट खाद
खेत या घर के किसी कोने में बड़ा गहरा गड्ढा खोदें। इसमें पशुओं का गोबर, पेड़-पौधों की सूखी पत्तियां, फसलों के अवशेष और रसोई का गीला कचरा जैसे फल-सब्जियों के छिलके डालते रहें। इन नैचुरल कचरों में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जिंक जैसे पोषक तत्व होते हैं। गड्ढे में नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव करें और महीने में एक-दो बार कुदाली या फावड़े से पलट दें। करीब दो से तीन महीने में यह कचरा सड़कर भुरभुरी काली जैविक खाद बन जाता है। यह खाद मिट्टी में नमी रोकती है और पौधों की जड़ों को पोषण देती है।
केंचुआ खाद यानी वर्मीकंपोस्ट
छायादार जगह पर तीन से चार फीट चौड़ा और सुविधा अनुसार लंबा पक्का या तिरपाल का बेड बनाएं। इसमें 10 से 15 दिन पुराना आधा सड़ा गोबर, सूखे पत्ते और पानी मिलाकर नमी बनाएं। फिर इसमें आइसिनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुए छोड़ दें। केंचुए जैविक कचरे को तेजी से खाकर भुरभुरी, गंधरहित और पोषक तत्वों वाली वर्मीकंपोस्ट में बदल देते हैं। यह खाद मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बढ़ाती है, जड़ों का फैलाव तेज करती है और लाभदायक बैक्टीरिया बढ़ाकर फसलों को बीमारियों से बचाती है।
जीवामृत और मटके की जैविक खाद
एक 200 लीटर प्लास्टिक ड्रम में पानी भरें। इसमें 10 किलो देशी गाय का ताजा गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, दो किलो पुराना गुड़, दो किलो बेसन और खेत की मेढ़ की एक मुट्ठी मिट्टी डालें। मिश्रण को रोज सुबह-शाम लकड़ी के डंडे से घुमाएं। चार से पांच दिनों में जीवामृत तैयार हो जाता है, जिसे सिंचाई के पानी के साथ खेत में बहाया जा सकता है। इसी तरह बड़े मिट्टी के मटके में खट्टी छाछ, नीम की पिसी पत्तियां और तांबे का टुकड़ा या तार डालकर 10 से 15 दिन छांव में ढककर रखें। यह घोल फसलों के लिए टॉनिक का काम करता है और इल्ली, फंगस व हानिकारक कीटों से बचाव के लिए प्राकृतिक कीटनाशक और फफूंदनाशक भी बन जाता है।
आखिर में चलते चलते बता दें कि, किसानों के लिए बेहतर तरीका यह हो सकता है कि वे मिट्टी की जांच, फसल की आवश्यकता और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार जैविक खाद का इस्तेमाल करें। यदि कंपोस्ट को संतुलित पोषण प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाए तो यह मिट्टी की दीर्घकालिक गुणवत्ता बनाए रखने में उपयोगी हो सकती है।इस तरह गोबर, सूखे पत्ते, फसल अवशेष और रसोई के जैविक कचरे को बेकार समझकर फेंकने के बजाय उनसे प्राकृतिक कंपोस्ट तैयार की जा सकती है। सही नमी, पर्याप्त हवा और नियमित पलटने के साथ कुछ महीनों में यही जैविक कचरा उपयोगी खाद में बदल सकता है। खेती में मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देने वाले किसानों के लिए यह कम लागत वाला और पर्यावरण के अनुकूल तरीका साबित हो सकता है।
