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पुरी। जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 आज शुरू हो रही है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भगवान बलभद्र को जगन्नाथ मंदिर से बाहर लाया गया है और वे रथ पर सवार होने वाले हैं। भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना होंगे।

जानकारी दे दें कि, तीनों रथ—नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन—को पुरी जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर रखा गया है। रथ यात्रा से पहले पुरी में धार्मिक अनुष्ठान तेजी से चल रहे हैं। तीनों रथों की विधिवत प्रतिष्ठा हो चुकी है। नंदीघोष रथ पर श्रीहनुमान, तालध्वज रथ पर श्रीनृसिंह और दर्पदलन रथ पर मां भुवनेश्वरी की स्थापना की गई है। वैदिक मंत्रोच्चार और हवन-यज्ञ के बाद भगवान के रथारोहण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

भारी बारिश के बीच भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। देश-विदेश से श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं। सालाना रथ यात्रा 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे के साथ समाप्त होगी। रथ यात्रा के दौरान ओडिशी नृत्यांगनाएं भी अपनी भक्ति व्यक्त करेंगी।यह विश्व प्रसिद्ध पर्व ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।

पारंपरिक अनुष्ठानों के बीच शुरू हुई रथारोहण की प्रक्रिया

रथ यात्रा से पहले श्रीजगन्नाथ मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठान जारी रहे। वैदिक मंत्रोच्चार, हवन-यज्ञ और पूजा-अर्चना के बीच भगवान बलभद्र को मंदिर से बाहर लाया गया। इसके बाद भगवान जगन्नाथ और देवी सुभद्रा के भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार बाहर आने और अपने-अपने रथों पर विराजमान होने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

श्रीमंदिर की परंपरा के अनुसार भगवानों को मंदिर से बाहर लाने की पाहंडी रस्म अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दौरान सेवायत विशेष शैली में भगवानों की प्रतिमाओं को झूमते हुए बाहर लेकर आते हैं। इस दृश्य को देखने के लिए श्रद्धालु घंटों पहले से मंदिर परिसर और ग्रैंड रोड पर एकत्र हो जाते हैं।

अंत में बताते चले कि, पुरी की रथ यात्रा को विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि इसे समावेशी और जनआस्था का पर्व माना जाता है।हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पवित्र आयोजन में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। परंपरा, श्रद्धा, संस्कृति और सामाजिक एकता का यह महापर्व भारत की धार्मिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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