नई दिल्ली।भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार (20 जनवरी 2026) को भारी गिरावट देखने को मिली, जिसने निवेशकों के बीच हड़कंप मचा दिया। बीएसई सेंसेक्स 1065.71 अंक या 1.28 प्रतिशत टूटकर 82,180.47 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 353 अंक या 1.38 प्रतिशत गिरकर 25,232.50 पर समाप्त हुआ। यह गिरावट लगातार दूसरे दिन की थी और बाजार में भारी बिकवाली का माहौल बना रहा। बीएसई की कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन सोमवार को 465.68 लाख करोड़ रुपये से घटकर 455.72 लाख करोड़ रुपये पर आ गई, यानी एक ही दिन में करीब 10.12 लाख करोड़ रुपये का निवेशकों का धन स्वाहा हो गया। यह गिरावट मई 2025 के बाद की सबसे बड़ी एक दिवसीय तबाही मानी जा रही है।
गौरतलब हैं कि, , यह गिरावट अचानक नहीं आई, बल्कि जनवरी 2026 की शुरुआत से ही बाजार दबाव में था। महीने की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी अपने उच्च स्तरों से लगातार फिसल रहे थे। पिछले कुछ सत्रों में सेंसेक्स 3,700 अंकों से अधिक और निफ्टी 4 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में भी भारी गिरावट देखी गई, जहां निफ्टी मिडकैप 2.62 प्रतिशत टूटकर 58,085 पर बंद हुआ। बाजार में 2,229 से अधिक शेयर लाल निशान में बंद हुए, जबकि केवल 628 ही हरे निशान में रहे।
इस भारी गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड (Greenland) को लेकर यूरोपीय देशों पर बढ़ती आक्रामकता है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की मांग को लेकर आठ यूरोपीय देशों (फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन सहित) पर 1 फरवरी 2026 से 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जो जून तक 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह धमकी वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंकाओं को बढ़ा रही है, जिससे निवेशक रिस्की एसेट्स से दूर होकर सेफ-हेवन में शिफ्ट हो रहे हैं।
वेशकों के लिए यह समय सतर्कता का है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक व्यापार तनाव और FII बिकवाली जारी रहने तक दबाव बना रहेगा। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अगर ट्रंप की टैरिफ नीतियों में नरमी आती है या मजबूत घरेलू आंकड़े आते हैं, तो रिकवरी संभव है। फिलहाल, बाजार में रिस्क-ऑफ मोड जारी है और निवेशक सेफ-हेवन एसेट्स की ओर रुख कर रहे हैं।यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है, लेकिन लंबी अवधि में मजबूत फंडामेंटल्स के साथ बाजार रिकवर कर सकता है। निवेशकों को पोर्टफोलियो डाइवर्सिफाई करने और लॉन्ग-टर्म दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी जा रही है।
