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मुंबई। मुंबई की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। ब्रिहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव परिणामों ने ठाकरे परिवार की विरासत पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। बाल ठाकरे की स्थापित शिवसेना की विरासत को बचाने और मराठी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए 20 साल बाद चचेरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने हाथ मिलाया था। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से बाल ठाकरे की राजनीतिक धरोहर वापस लेना और ‘मराठी माणूस’ की अवधारणा को फिर से मजबूत करना। लेकिन शुक्रवार को घोषित परिणामों ने इस गठबंधन को करारा झटका दिया है।

याद दिलाते चले कि, BMC चुनावों से पहले उद्धव और राज ठाकरे की मुलाकातें शुरू हुईं। दिसंबर 2025 में दोनों ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गठबंधन की घोषणा की। उद्धव ने कहा, “केवल ठाकरे ही महाराष्ट्र का नेतृत्व कर सकते हैं।” राज ठाकरे ने भी ‘महाराष्ट्र से बड़ा कोई विवाद नहीं’ कहकर भावुक अपील की। उनका मुख्य मुद्दा ‘मराठी अस्मिता’ था, खासकर हिंदी थोपने के विवाद को लेकर। मई से अगस्त 2025 तक मुंबई और उपनगरों में मराठी और हिंदी भाषियों के बीच तनाव बढ़ा था।

परिणामों के अनुसार, महायुति गठबंधन ने 118 सीटें जीतीं, जो बहुमत से चार अधिक हैं। इसमें बीजेपी ने सबसे ज्यादा 89 सीटें हासिल कीं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। दूसरी ओर, शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं, जबकि एमएनएस को मात्र 6-10 सीटों पर सफलता मिली। कांग्रेस ने स्वतंत्र रूप से लड़ते हुए 11 वार्ड जीते। शरद पवार की एनसीपी (एसपी) का खाता नहीं खुल सका। कुल मिलाकर, ठाकरे गठबंधन को मराठी बहुल इलाकों में कुछ मजबूती मिली, जैसे दादर-माहिम, वरली, सेवरी आदि में, लेकिन गैर-मराठी आबादी वाले वार्डों में भारी नुकसान हुआ।

हम आपको बता दें कि, ठाकरे परिवार के लिए यह झटका गहरा है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) दूसरे नंबर पर रही, लेकिन BMC पर कब्जा खो दिया। यह पहली बार है जब मुंबई में बीजेपी का मेयर बनेगा। राज ठाकरे के लिए स्थिति और गंभीर है—एमएनएस की राज्य पार्टी की मान्यता खतरे में पड़ सकती है। विपक्षी गठबंधन एमवीए की स्थिति भी कमजोर हुई है। अगर शिवसेना (यूबीटी), कांग्रेस और एनसीपी (एसपी) एक साथ लड़ते, तो शायद स्थिति अलग होती।

कुल मिला कर यह चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव का संकेत है। ठाकरे परिवार की विरासत अब चुनौतीपूर्ण दौर में है। बाल ठाकरे की ‘मराठी माणूस’ की राजनीति को बीजेपी ने प्रभावी ढंग से काउंटर किया। भविष्य में ठाकरे भाइयों को अपनी रणनीति बदलनी होगी—क्षेत्रीय मुद्दों के साथ विकास और समावेशी एजेंडे को अपनाना होगा। मुंबई के मतदाताओं ने साफ संदेश दिया है कि पारिवारिक एकजुटता हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती। राजनीति में जनता का विश्वास और कामकाज सबसे महत्वपूर्ण है।

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