नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि मतदाता सूची से जुड़ी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में किसी भी तरह की रुकावट, हस्तक्षेप या बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को इस मामले में एक सप्ताह की मोहलत देते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि चुनाव आयोग के कार्य में सहयोग सुनिश्चित किया जाए और निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए जरूरी सभी कदम उठाए जाएं।
क्या है SIR और क्यों है अहम
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SIR, मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध करने की एक अहम प्रक्रिया है। इसके तहत मतदाता सूची में नामों का सत्यापन किया जाता है, गलत या फर्जी प्रविष्टियों को हटाया जाता है और योग्य नागरिकों के नाम जोड़े जाते हैं। लोकतंत्र की बुनियाद माने जाने वाले स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी मानी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची की शुद्धता पर ही चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता टिकी होती है। यदि इस प्रक्रिया में बाधा आती है, तो इसका सीधा असर लोकतंत्र और जनता के मतदान के अधिकार पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह आदेश आने वाले समय में चुनावी प्रक्रियाओं को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि राज्य सरकारें और प्रशासन चुनाव आयोग के संवैधानिक दायित्वों में पूरा सहयोग दें।
इस कड़ी में अब सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं। एक सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को यह बताना होगा कि SIR प्रक्रिया को लेकर क्या कदम उठाए गए हैं और चुनाव आयोग को किस तरह का सहयोग दिया जा रहा है।यदि अदालत को संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो यह मामला और गंभीर मोड़ ले सकता है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट संदेश है कि SIR या किसी भी चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश लोकतंत्र के खिलाफ मानी जाएगी और उस पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।
