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समाचार मिर्ची

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच दो-ध्रुवीय संघर्ष बन गया है। विभिन्न सर्वे एजेंसियों के ओपिनियन पोल कांटे की टक्कर का संकेत दे रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व में अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा जता रही है, जबकि भाजपा परिवर्तन के मुद्दे को आगे बढ़ा रही है।

तृणमूल कांग्रेस को भरोसा है कि लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं ग्रामीण बंगाल और महिला मतदाताओं के बीच उसकी स्थिति मजबूत रखेंगी। पार्टी ‘बंगाल की बेटी’ का नैरेटिव और स्थानीय अस्मिता को अपना प्रमुख ट्रंप कार्ड मान रही है। इस बार तृणमूल ने बड़े पैमाने पर टिकटों में बदलाव कर नए चेहरों को मौका दिया है। हालांकि, शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन वितरण में कथित अनियमितताओं जैसे भ्रष्टाचार के आरोप पार्टी के लिए चुनौती बने हुए हैं।

भाजपा इन असंतोषों को वोट में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी कानून-व्यवस्था और बेरोजगारी के मुद्दों को प्रमुख हथियार बना रही है। भाजपा का आंतरिक आकलन उसे 160 से अधिक सीटें दिलाने की बात कह रहा है। अभिषेक बनर्जी ऐतिहासिक जीत का दावा कर रहे हैं।

वाममोर्चा और कांग्रेस इस बार अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं और दोनों ही दल हाशिये पर नजर आ रहे हैं। कांग्रेस पांच से 10 सीटों के अनुमान के साथ मैदान में है, जबकि वाम दलों ने नौशाद सिद्दीकी की आईएसएफ के साथ गठबंधन किया है। मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुमायूं कबीर का एआईएमआईएम के साथ जाना तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है।चुनाव अब ‘भरोसे बनाम बदलाव’ की जंग बन चुका है। परिणाम चार मई को घोषित होंगे। फिलहाल बंगाल का हर कोना इस सियासी द्वंद्व का गवाह बना हुआ है।

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