कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया के बाद राज्य की वोटर लिस्ट से कुल करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए हैं। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है। एसआईआर शुरू होने के समय राज्य में कुल 7.66 करोड़ मतदाता थे।
इनमें से 63 लाख से अधिक वोटरों के नाम फरवरी में चुनाव आयोग द्वारा जारी सूची में हटाए गए थे। इन्हें अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट श्रेणी में रखा गया था। इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के दायरे में रखा गया था, क्योंकि उनके रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग, जेंडर या माता-पिता से उम्र संबंधी तार्किक गड़बड़ियां पाई गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को इन वोटरों की योग्यता सत्यापित करने का काम सौंपा गया। चुनाव आयोग के अनुसार, इन 60 लाख में से करीब 27 लाख (लगभग 45 प्रतिशत) वोटरों को अयोग्य घोषित किया गया।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पूरक सूचियां जारी की जाएंगी। अयोग्य घोषित वोटरों के नाम पूरी तरह हटाए नहीं गए हैं और उनके लिए 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहां वे अपनी योग्यता साबित कर सकते हैं। हालांकि, वोटर लिस्ट 23 अप्रैल को 152 विधानसभा सीटों के लिए और 9 अप्रैल को 142 सीटों के लिए फ्रीज कर दी गई है।एसआईआर प्रक्रिया नवंबर से फरवरी के बीच नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में हुई, लेकिन पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक विवाद हुआ। मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और मालदा जिलों में नाम हटाने की संख्या सबसे अधिक रही।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के इस व्यापक पुनरीक्षण ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर इसे मतदाता सूची की सफाई और पारदर्शिता के लिए जरूरी कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने से कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रिब्यूनलों में कितने मामलों का निपटारा होता है और कितने मतदाता अपने अधिकारों को पुनः हासिल कर पाते हैं।
