नागपुर/छिंदवाड़ा: भारतीय इतिहास के पन्नों में कई ऐसे साम्राज्य रहे हैं, जिन्होंने न केवल अपनी वीरता का लोहा मनवाया, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सांस्कृतिक स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया। ऐसा ही एक गौरवशाली और पराक्रमी इतिहास रहा है प्राचीन देवगढ़ साम्राज्य और उसके महान शासकों का। छिंदवाड़ा से लेकर नागपुर महानगर तक फैला यह साम्राज्य अपनी अटूट प्रशासनिक व्यवस्था, अद्वितीय कला और अदम्य साहस के लिए जाना जाता है।
भारत का सबसे ज्यादा हमले झेलने वाला किला
इतिहासकारों और प्राचीन दस्तावेजों के अनुसार, देवगढ़ साम्राज्य भारत के उन गिने-चुने राज्यों में से एक है, जिसने सबसे अधिक बाहरी और क्षेत्रीय आक्रमणों का सामना किया। इस साम्राज्य को मिटाने और इसकी अकूत धन-संपदा को लूटने के लिए समय-समय पर कई बड़ी महाशक्तियों ने हमले किए:
- मुग़लों के भीषण आक्रमण: अकबर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब जैसे शक्तिशाली मुग़ल शासकों की विशाल फौजें भी देवगढ़ को पूरी तरह अपने नियंत्रण में नहीं ले पाईं।
- मराठों से कड़ा मुकाबला: रघुजी भोंसले से लेकर नागपुर के छत्रपों तक, देवगढ़ के वीरों ने हर मोर्चे पर कड़ा मुकाबला किया।
- पड़ोसी राजपूत राजाओं की चुनौतियाँ: साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित पड़ोसी राजाओं ने भी कई बार देवगढ़ की ताकत को आजमाया।
- आदिलशाही सल्तनत का मोर्चा: बीजापुर की आदिलशाही सेनाओं को भी देवगढ़ के शासकों ने धूल चटाई।
- निज़ाम और मराठों का साझा चक्रव्यूह: इतिहास में ऐसा दौर भी आया जब दो बड़े दुश्मन (निज़ाम और मराठे) एक होकर टूटे, लेकिन देवगढ़ का हौसला फिर भी नहीं डिगा।
- ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेज़): भारत पर कब्ज़ा करने वाली ब्रिटिश हुकूमत को भी देवगढ़ में पैर जमाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा।
पिंडारियों का आतंक: लुटेरी टोलियों और पिंडारियों के हमलों से भी इस साम्राज्य ने अपनी प्रजा की ढाल बनकर रक्षा की।
महाराजा अजानबाहु जाटवा शाही की विरासत और राजा बख्त बुलंद शाह का पराक्रम
इस साम्राज्य की नींव शक्तिशाली नागवंशी राज गोंड राजा महाराजा अजानबाहु जाटवा शाही ने रखी थी, जिन्होंने 15वीं-16वीं शताब्दी (लगभग 1570-1597) के दौरान शासन किया। अबुल फज़ल की प्रसिद्ध कृति ‘आईन-ए-अकबरी’ में भी उनकी विशाल सेना (2,000 घुड़सवार, 50,000 पैदल सैनिक और 100 हाथी) का उल्लेख मिलता है।
इसी राजवंश के आगे चलकर महान दूरदर्शी शासक भोजशाह उर्फ राजा बख्त बुलंद शाह द्वितीय हुए, जिन्होंने आधुनिक नागपुर शहर को बसाया। कठिन राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उन्होंने इस्लाम ज़रूर कबूल किया, लेकिन मुग़लों के सामने अपनी शर्तें पूरी दृढ़ता से रखीं। उन्होंने मुग़ल दरबार में साफ़ कर दिया कि खान-पान और पारिवारिक संबंधों में वे अपनी मूल पहचान बनाए रखेंगे। उन्होंने देवगढ़ की प्राचीन राजगोंड क्षत्रिय संस्कृति, चंडी पूजन और बली प्रथा जैसी अनमोल परंपराओं को पूरी शान के साथ जीवित रखा।
आज भी जीवंत है गोंड राजवंश का स्वाभिमान
450 से अधिक वर्षों तक शान से खड़े रहने वाले इस साम्राज्य के वंशज आज भी अपने गौरवशाली गोत्र और सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। राजगोंड समाज आज भी अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखता है। समाज के लोग कड़ी मेहनत और मजदूरी कर लेंगे, लेकिन कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते।
यही कारण है कि आज भी ग्रामीण और क्षेत्रीय अंचलों में जब राजगोंड परिवार का कोई व्यक्ति किसी अन्य समुदाय के शुभ कार्यों या विवाह समारोहों में सम्मिलित होता है, तो उन्हें ‘ठाकुर देव’ के रूप में संबोधित किया जाता है और माथे पर हल्दी या भगवा तिलक लगाकर पूरे आदर-सत्कार के साथ सम्मानित किया जाता है।
इतिहास के पन्नों में कहाँ खो गया यह गौरव?
इतने हमलों और झंझावातों को झेलने के बाद भी सदियों तक अडिग रहने वाले देवगढ़-नागपुर साम्राज्य का ज़िक्र आज की मुख्यधारा की इतिहास की किताबों में बेहद कम मिलता है। आज ज़रूरत है कि देवगढ़ किले की इन ऐतिहासिक विरासतों और अनसुने योद्धाओं की कहानियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए।
