जिस तारीख को एक मां ने अपनी बेटी को विवाह की रस्मों के साथ विदा किया था ठीक उसी तारीख को अगले महीने उस मां की अचानक मृत्यु हो जाती है।
ये कोई खबर नहीं है बल्कि विचार है मन के उदगार है जो कभी कभी चमत्कारिक रूप से घटित होता है जिसे देख सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है कि ईश्वर का ये कैसा फैसला हो सकता है कि एक बेटी को उसकी शादी की तारीख पर ही ग्रहण लगा देता है। दरअसल हुआ कुछ ऐसा कि 19 जुलाई को सुबह सुबह फोन की घंटी बजी तो खबर मिली कि पिछले महीने जिस भाई की शादी हुई थी उनकी सास का अचानक 18 जुलाई की रात को स्वर्गवास हो गया। ये खबर सुनकर मुझे झटका सा लगा क्योंकि मैं उसी शादी को अटैंड करने के लिए शहर से गांव आया था। ज्यादा हैरानी तो तब हुई जब ये मुझे याद आया कि यार तारीख तो 18 औऱ 19 जून ही थी जब शादी की रस्में पूरे विधि विधान के साथ चल रही थीं।
खैर, खबर मिलते ही उनके घर पहुंचे जहां सारे रिश्तेदार आए हुए थे हर कोई उनके जीवन को याद कर रहा था तो कोई उनके व्यवहार को.. तो कोई अब परिवार को लेकर चिंतित दिखाई दिया कि अब तीनों बेटियां बिहाई जा चुकी हैं। अब घर में केवल पिता-पुत्र बचे हैं घर की लक्ष्मी का चले जाना मतलब पूरा घर सुनसान और रौनक का चले जाना। यह सब सुनते सुनते मैं आगे बढ़ रहा था कदम आगे बढ़ना नहीं चाह रहे थे क्योंकि जो आगे तस्वीरें थी उसके लिए पत्थर दिल होना पड़ता है ये किसी भावुक इंसान के बस की बात नहीं है। कि आप महीने भऱ पहले बिहाई बेटी के आंसू और चीख को कानों से सुन सके.. आसान नहीं है उस बेटे के मौन और दुख से छलनी मन को देख पाना जिसने अभी दुनिया देखी ही नहीं है। जिसे अभी मां की ममता की आस थी। मगर एक पल में सारे सपने चकनाचूर हो चुके थे।
खैर जैसे तैसे मैंने अपने कदमों को आगे बढ़ाया और घर के आंगन में उस जगह पर पहुंचा जहां पिछले 18 जून को मैंने उस मां ने पूरे श्रृंगार के साथ अपने दामाद का स्वागत किया था। नाक में मुखड़ा सजा था औऱ अपने हाथों से पकवान खिलाए थे… सारी रस्में निभाई थीं। मुझे एक एक कर हर वो तस्वीर याद आ रही थी। मगर मेरी आंखों से आंसू उस वक्त आ गए जब मैंने देखा कि सजी तो वे आज भी थीं.. मुखड़ा आज भी नाक पर लटका अपना फर्ज अदा रहा था। बिल्कुल उसी अंदाज में सजी थीं जैसे ठीक एक महीने पहले अपनी बेटी की विदाई के लिए सजी थीं। मगर आज उस मां की अर्थी सजी थी। वह खुद नहीं सजी थी उसे आज सजाया गया था। यह सब देखकर मन भारी हो गया था कि हे विधाता तू कितना निष्ठुर है कि एक बेटी को महीने भर उसकी शादी की तारीख के दिन ये कहने का मौका नहीं दिया कि मां एक महीना हो गया है मां मैं यहां खुश हूं या आपकी याद आ रही है। ठीक उसी दिन वो मां जिससे न जाने कितनी बातें करनी थी अचानक छोड़कर चली गईं।
इस घटना ने मन को बड़ी पीड़ा से भर दिया कि आखिर विधाता की रची इस दुनिया में कितना कुछ अस्वीकार करने का मन करता है मगर सच यही है कि समय के चक्र के आगे हर कोई बेबस हैं लाचार है औऱ हम सबको स्वीकार करना ही होगा।
एक बात औऱ जो वहां महसूस की… आपने अपने जीवन में क्या कमाया है उसका मूल्यांकन तब होता है जब आपकी अंतिम यात्रा निकल रही हो तब उस शवयात्रा के पीछे कितने लोग चल रहे हैं वो आपके जीवन को सार्थक करते हैं। मैंने देखा कि दो हजार करीब नाते रिश्तेदार उस शवयात्रा में शामिल होने पहुंचे थे जिधर भी नजर जाती थी लोग ही लोग नजर आ रहे थे। वाकई इंसान ने अपने जीवन में क्या कमाया है वो उसके अंतिम पलों में पता चलता है। खैर.. समय की क्रूरता के आगे हर कोई बेबस है हर कोई यहां किराएदार ही है… एक न एक दिन सभी को जाना है। मगर कुछ घटनाएं मन को कचोट देती हैं औऱ हमारा मन, मस्तिस्क ईश्वर के फैसले को संदेह की नजर से देखने लगता है। मगर हम अविश्वास की उस सीमा को नहीं लांघते औऱ उसी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि दुख से जूझ रहे परिवार को ताकत दे.. हम सब शोक संतप्त परिवार के साथ हैं।
