नई दिल्ली।खेती की जमीन पर बिना सरकारी अनुमति के कोई भी कमर्शियल काम शुरू करना गैरकानूनी माना जाता है। भारत में जमीन के इस्तेमाल का तरीका बदलने की इस प्रक्रिया को चेंज ऑफ लैंड यूज कहा जाता है। अगर कोई अपनी एग्रीकल्चर लैंड पर दुकान, गोदाम, मॉल या कोई बिजनेस सेटअप शुरू करना चाहता है तो सबसे पहले संबंधित अथॉरिटी से इसे कमर्शियल में कन्वर्ट कराना जरूरी है।
जानकारी देते चले कि, लैंड कन्वर्ट कराने में आने वाला खर्च किसी एक फिक्स रकम पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह अलग-अलग राज्यों और लोकेशन के हिसाब से तय होता है। आमतौर पर जमीन की कुल कीमत का 3 प्रतिशत से लेकर 10 प्रतिशत तक कन्वर्जन चार्ज लिया जाता है। बड़े शहरों और प्राइम लोकेशन की जमीनों के लिए यह फीस ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा होती है। अलग-अलग राज्यों के अपने-अपने लैंड रेवेन्यू रूल्स होते हैं। राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जमीन के एरिया और सर्किल रेट के हिसाब से चार्जेस तय किए जाते हैं। आंध्र प्रदेश में जमीन की मार्केट वैल्यू का करीब 3 प्रतिशत चार्ज लिया जाता है जबकि हरियाणा और पंजाब में प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से रेट तय होते हैं।
इस संबंध में बता दें कि, सरकारी फीस के अलावा एप्लीकेशन फीस, स्टैम्प ड्यूटी, लीगल एडवाइजर या वकील की फीस, डॉक्यूमेंटेशन का खर्च और विकास शुल्क भी शामिल हो सकते हैं। जरूरी कागजातों में जमीन की खतौनी, खसरा मैप, टाइटल डीड और पहचान पत्र शामिल हैं। अगर जमीन पर लोन चल रहा हो तो बैंक से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट भी लेना पड़ता है। आवेदन से पहले मास्टर प्लान और जोनिंग रूल्स की जांच जरूरी है क्योंकि ग्रीन बेल्ट या रिजर्व एरिया में आने पर परमिशन मिलना मुश्किल हो सकता है।कन्वर्जन के लिए जिले के कलेक्टर, तहसीलदार या स्थानीय विकास प्राधिकरण के पास आवेदन करना होता है। आवेदन के बाद रिवेन्यू डिपार्टमेंट अधिकारी जमीन की फिजिकल जांच करते हैं। अगर सभी डाक्यूमेंट्स सही पाए जाते हैं तो तहसील से अप्रूवल जारी कर दिया जाता है। बिना कानूनी परमिशन के कमर्शियल इस्तेमाल पर भारी पेनल्टी, जुर्माना या संपत्ति ध्वस्त होने का खतरा रहता है। सही पेपर्स होने पर पूरी प्रोसेस में आमतौर पर 30 से 90 दिनों का समय लगता है और कई राज्यों में यह सुविधा ऑनलाइन पोर्टल के जरिए भी उपलब्ध है।
हर राज्य में अलग हो सकते हैं नियम
भारत में भूमि राजस्व और भूमि उपयोग से जुड़े नियम राज्य स्तर पर अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश में लागू प्रक्रिया राजस्थान, पंजाब, हरियाणा या आंध्र प्रदेश से अलग हो सकती है।
उदाहरण के तौर पर कुछ राज्यों में शुल्क जमीन के एरिया और सर्किल रेट के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है, जबकि कुछ जगहों पर बाजार मूल्य या प्रति वर्ग मीटर की दर महत्वपूर्ण हो सकती है।
आंध्र प्रदेश में जमीन की मार्केट वैल्यू के आधार पर लगभग 3 प्रतिशत शुल्क का उल्लेख किया जाता है, जबकि हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कुछ मामलों में क्षेत्रफल के आधार पर दरें लागू हो सकती हैं। वहीं उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी जमीन के क्षेत्रफल, स्थान और संबंधित सरकारी दरों के आधार पर शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।
कहां करना होता है आवेदन?
भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए आवेदन की प्रक्रिया राज्य के अनुसार बदलती है। संबंधित मामले में आवेदन जिला कलेक्टर, तहसीलदार, राजस्व विभाग या स्थानीय विकास प्राधिकरण के पास किया जा सकता है।
कुछ राज्यों में आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी स्वीकार किए जाते हैं। वहीं कुछ प्रक्रियाओं में ऑनलाइन आवेदन के साथ दस्तावेजों की जांच और अन्य विभागीय कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।
आवेदन जमा होने के बाद राजस्व या संबंधित विभाग के अधिकारी जमीन की स्थिति और दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर जमीन का फिजिकल इंस्पेक्शन भी किया जा सकता है।
यदि जमीन नियमों के अनुरूप पाई जाती है और दस्तावेज सही होते हैं, तो संबंधित प्राधिकरण द्वारा भूमि उपयोग परिवर्तन की अनुमति जारी की जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जमीन का कन्वर्जन शुल्क पूरे भारत में एक जैसा नहीं है। 3 से 10 प्रतिशत जैसी दरें केवल सामान्य अनुमान के तौर पर देखी जानी चाहिए। वास्तविक राशि आपके राज्य, जिले, जमीन की लोकेशन, क्षेत्रफल, सर्किल रेट या बाजार मूल्य और लागू नियमों के आधार पर तय होगी। इसलिए आवेदन या निवेश से पहले संबंधित तहसील, कलेक्टर कार्यालय या विकास प्राधिकरण से मौजूदा नियम और शुल्क की आधिकारिक जानकारी लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।
