नई दिल्ली। आज के समय में कृषि क्षेत्र में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ औषधीय और कम पानी चाहने वाली फसलों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। एलोवेरा की खेती किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। कॉस्मेटिक्स, आयुर्वेदिक दवाइयों और हेल्थ ड्रिंक्स में इसकी भारी मांग के कारण इसकी खेती से लाभ कमाया जा सकता है। यह कम पानी और कम लागत में की जा सकती है।
यहां यह जानकारी दे दें कि, एलोवेरा की खेती के लिए बहुत ज्यादा उपजाऊ जमीन या ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। यह बंजर, पथरीली और हल्की रेतीली मिट्टी में भी आसानी से उग जाता है। खेत में पानी बिल्कुल नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि जलभराव से इसकी जड़ें सड़ सकती हैं। इसके विकास के लिए गर्म और शुष्क जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है। खेत की एक से दो बार अच्छी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाकर और पाटा लगाकर समतल बनाने की जरूरत होती है। पौधों की रोपाई का सबसे सही समय जुलाई से अगस्त यानी वर्षा ऋतु का शुरुआती दौर होता है। पौधे से पौधे के बीच लगभग 60×45 सेमी की दूरी रखनी चाहिए।
अंत में यह बता दें कि, कि, एलोवेरा को बहुत कम देखरेख और खाद-पानी की जरूरत होती है। खेत तैयार करते समय थोड़ी गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाना फायदेमंद रहता है। रासायनिक खादों की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती। शुरुआत में हल्की सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन पौधे स्थापित होने के बाद इसे बहुत कम पानी चाहिए और बरसात के दिनों में सिंचाई की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती। पौधे लगाने के लगभग 8 से 10 महीने बाद इसकी पत्तियां कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। एक बार पौधा तैयार होने के बाद साल में 3 से 4 बार इसकी पत्तियों को काटा जा सकता है। इन पत्तियों को आयुर्वेदिक कंपनियों, हर्बल उत्पाद बनाने वाली फैक्ट्रियों या स्थानीय मंडियों में बेचकर मुनाफा कमाया जा सकता है।
