अरुणाचल प्रदेश की पाँच प्रमुख नदियाँ—तिराप, लोहित, सुबनसिरी, सियांग और कामेंग—एक असामान्य और भावुक विदाई की साक्षी बनीं। समाजसेवी और शिक्षाविद ए. बालकृष्णन की अंतिम इच्छा थी कि उनकी अस्थियाँ उसी भूमि में विलीन हों जिसे उन्होंने लगभग पाँच दशक पहले अपनी कर्मभूमि चुना था।
1 अक्टूबर से 4 अक्टूबर के बीच उनकी अस्थियाँ अरुणाचल के विभिन्न हिस्सों में ले जाई गईं और अलग-अलग घाटों पर श्रद्धापूर्वक नदियों में प्रवाहित की गईं। इस दौरान विवेकानंद केंद्र विद्यालय पूर्व छात्र संघ (VKVAA) के सदस्य, स्थानीय लोग उपस्थित रहे, सभी ने मौन प्रार्थना के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की।
ए. बालकृष्णन, जो विवेकानंद केंद्र के पूर्व अखिल भारतीय अध्यक्ष रहे और VKV आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार थे, उनका निधन 27 अगस्त को कन्याकुमारी में हुआ। वे 88 वर्ष के थे।
1970 के दशक में जीवनव्रती के रूप में अरुणाचल पहुँचे बालकृष्णन ने कठिन परिस्थितियों में दूरदराज़ इलाकों तक शिक्षा पहुँचाने का कार्य किया। 1977 में किमिन के पास शेर में पहला VKV स्थापित हुआ, जिसके बाद कई विद्यालय राज्य के सुदूर इलाकों तक पहुँचे।
उनके योगदान को मान्यता देते हुए अरुणाचल सरकार ने 2014 में उन्हें राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया था। वाकई उनके जीवन की ये यात्रा तो प्रेरणादायक है ही जाते जाते उनका प्रकृति और कर्मभूमि से प्रेम सभी को भावुक भी कर गया। समाचार मिर्ची अरूणाचल प्रदेश की माटी से प्रेम करने वाले उस महान शिक्षाविद को नमन करता है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
