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नई दिल्ली। खेतों की सेहत सुधारने के लिए किसान ढैंचा जैसी हरी खाद की फसल उगाते हैं। इसे न तो काटा जाता है और न ही बाजार में बेचा जाता है। बल्कि इसे मिट्टी में मिलाकर जमीन को उपजाऊ बनाया जाता है।खेती-किसानी में आमतौर पर फसलों को काटकर बेचने और मुनाफा कमाने के लिए उगाया जाता है। लेकिन ढैंचा एक ऐसी फसल है जिसे किसान खेत में उगाते हैं पर न काटते हैं और न बेचते हैं। इसे खेत में ही ट्रैक्टर चलाकर मिट्टी में पलट दिया जाता है। यह तरीका मिट्टी की सेहत सुधारता है और खेतों को प्राकृतिक न्यूट्रिएंट्स प्रदान करता है।

इस संबंध में बता दें कि, रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से खेतों की उपजाऊ क्षमता कम हो रही है। ढैंचा फसल मिट्टी के लिए बूस्टर की तरह काम करती है। इसे खेत में सड़ाने से मिट्टी को भारी मात्रा में नाइट्रोजन और ऑर्गेनिक कार्बन मिलता है। इससे जमीन की नमी सोखने की क्षमता बढ़ती है और मिट्टी भुरभुरी हो जाती है।

क्या है ढैंचा और क्यों है खास?

ढैंचा एक दलहनी पौधा है, जिसे मुख्य रूप से हरी खाद के रूप में उगाया जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसकी जड़ों में मौजूद सूक्ष्म जीव वातावरण से नाइट्रोजन को ग्रहण कर मिट्टी में जमा करते हैं। यही कारण है कि इसे प्राकृतिक नाइट्रोजन फैक्ट्री भी कहा जाता है।

जब यह फसल 40 से 50 दिन की हो जाती है और इसमें फूल आने लगते हैं, तब इसे खेत में ही रोटावेटर, हैरो या ट्रैक्टर की मदद से मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद पौधे धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद में बदल जाते हैं और मिट्टी को भरपूर पोषण प्रदान करते हैं।

कुल मिलाकर, ढैंचा केवल एक फसल नहीं बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने का प्राकृतिक उपाय है। यदि अधिक किसान इसे अपनी खेती प्रणाली में शामिल करें तो खेती की लागत कम करने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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