नई दिल्ली। भारत में कई किसान पारंपरिक धान और गेहूं की खेती छोड़कर ड्रैगन फ्रूट की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। यह ट्रॉपिकल फल हिलोसेरियस अंडटस नामक चढ़ाई वाले कैक्टस पर उगता है, जो मुख्य रूप से दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है। इसके पौधे में बड़े-बड़े तनों पर फल लगते हैं, जो खाने में स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं।
ड्रैगन फ्रूट की खेती कम खर्च में शुरू की जा सकती है। एक बीघा भूमि में 800 से 1000 पौधे लगाए जा सकते हैं। पौधों के बीच 6 फीट की दूरी रखनी चाहिए। इसमें बहुत कम सिंचाई की जरूरत पड़ती है और साल में 4 से 5 बार फल आते हैं।एक बीघा में लगे 800 पौधों पर प्रत्येक पौधे में औसतन 60 से 80 फल लगते हैं। एक फल का वजन लगभग 300 ग्राम होता है। बाजार में इसका भाव 150 रुपये प्रति किलो तक मिल जाता है। एक बार की उपज में खर्च काटकर किसान लगभग 1 लाख रुपये तक बचा सकते हैं। महीने में लाखों रुपये की कमाई की संभावना बताई गई है।
क्या है ड्रैगन फ्रूट?
ड्रैगन फ्रूट एक ट्रॉपिकल यानी उष्णकटिबंधीय फल है, जो मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के देशों में पाया जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे हिलोसेरियस अंडटस (Hylocereus Undatus) कहा जाता है। यह एक प्रकार के चढ़ाई वाले कैक्टस पर उगता है।
इस फल का बाहरी हिस्सा गुलाबी या लाल रंग का होता है, जबकि अंदर का गूदा सफेद या लाल रंग का हो सकता है। इसके बीज छोटे-छोटे काले रंग के होते हैं। स्वाद में हल्का मीठा और पौष्टिक होने के कारण इसकी मांग शहरी बाजारों में तेजी से बढ़ रही है।
ड्रैगन फ्रूट में फाइबर, विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग इसे पसंद कर रहे हैं। होटल, जूस सेंटर और सुपरमार्केट में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल धान और गेहूं पर निर्भर रहने से किसानों की आय सीमित रह जाती है। ऐसे में बाजार की मांग के अनुसार फलों और सब्जियों की खेती करना किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है।ड्रैगन फ्रूट जैसी फसलें कम मेहनत और कम पानी में अधिक लाभ देने की क्षमता रखती हैं। हालांकि खेती शुरू करने से पहले मिट्टी, मौसम और बाजार की जानकारी लेना जरूरी है।भारत में बदलते कृषि परिदृश्य के बीच ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल रही है। यदि सही तकनीक और बाजार प्रबंधन के साथ इसकी खेती की जाए, तो यह पारंपरिक खेती का लाभकारी विकल्प बन सकती है।
