नई दिल्ली। सरकार किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए हर साल बड़ी राशि खर्च करती है। खाद सब्सिडी कंपनियों को दी जाती है, जिससे बाजार में महंगी खाद किसानों को कम दाम पर मिल पाती है। इससे खेती की लागत कम होती है और फसल उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता।
सरकार यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके जैसी खादों पर सब्सिडी देती है। इनमें सबसे ज्यादा सब्सिडी यूरिया पर है। यूरिया की एक बोरी की असली कीमत करीब 2400 रुपये है, लेकिन किसानों को यह लगभग 265 रुपये में मिल जाती है। बाकी राशि सरकार कंपनियों को सब्सिडी के रूप में प्रदान करती है। अनुमान के मुताबिक, सरकार हर साल खाद सब्सिडी पर करीब दो लाख करोड़ रुपये तक खर्च करती है।
सब्सिडी पहुंचाने की प्रक्रिया में फर्टिलाइजर कंपनियां खाद का उत्पादन करती हैं। दुकान पर किसान खाद खरीदते समय पीओएस मशीन में आधार नंबर या लिंक्ड मोबाइल दर्ज कराता है। इससे सही पहचान होती है और कंपनियां सरकार से सब्सिडी क्लेम करती हैं। किसानों को अधिकृत दुकानों से ही खाद खरीदनी होती है।इस सब्सिडी से किसानों को कम खर्च में खाद मिलती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है और कालाबाजारी पर नियंत्रण रहता है। हालांकि, बढ़ती जरूरतों के कारण सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, जिसके चलते जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
