समाचार मिर्ची

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नई दिल्ली। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली, पंजाब, पूर्वी राजस्थान, बिहार, विदर्भ (महाराष्ट्र), छत्तीसगढ़ और झारखंड में बड़े पैमाने पर लू को लेकर अलर्ट जारी किया है। अत्यधिक गर्मी अब स्वास्थ्य समस्या से आगे बढ़कर आर्थिक संकट बन गई है। इससे उत्पादकता घट रही है, मेडिकल खर्च बढ़ रहे हैं और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहा है।

देश की GDP पर पड़ेगा असर

अत्यधिक गर्मी के कारण अब तक लगभग 159 अरब डॉलर की उत्पादकता का नुकसान हो चुका है, जो भारत की आय का करीब 5.4 प्रतिशत है। हर साल 160 बिलियन से ज्यादा काम के घंटे बर्बाद हो जाते हैं, क्योंकि मजदूर पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। 2021-22 में अनुमानित 160-191 अरब श्रम घंटों का नुकसान हुआ, जो GDP के 5.4-6.3 प्रतिशत के बराबर था। इस दशक के अंत तक लू से GDP का 2.5-4.5 प्रतिशत नुकसान हो सकता है, जबकि नीतिगत कदम न उठाए जाने पर इस सदी के मध्य तक 8.7 प्रतिशत तक का नुकसान संभव है। कृषि, निर्माण और शहरी अनौपचारिक मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

2024 में गर्मी से प्रभावित क्षेत्रों में 247 अरब श्रम घंटों का नुकसान हुआ, जिससे करीब 194 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। IMD के नवीनतम बुलेटिन के अनुसार, इस साल उच्च दिन के तापमान और रात की गर्मी से देश के बड़े हिस्से में गर्मी का तनाव बढ़ने की उम्मीद है।

हीटस्ट्रोक के इलाज का खर्च ज्यादा

गर्मी से जुड़ी बीमारियों जैसे डिहाइड्रेशन, थकावट और हीटस्ट्रोक से मेडिकल खर्च बढ़ रहे हैं। अपोलो हॉस्पिटल्स के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. नितिन जगासिया के अनुसार, गंभीर हीटस्ट्रोक के इलाज में प्रति मरीज 1 लाख से 2 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है। PB Health के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मोहित माथुर ने बताया कि 40 प्रतिशत शहरी और 60 प्रतिशत ग्रामीण परिवार इन बिलों के भुगतान के लिए कर्ज लेते हैं या संपत्ति बेचते हैं। इसमें ठीक होने के दौरान आय का नुकसान भी शामिल है। डॉ. माथुर ने कहा कि 2024-25 में व्यापक आर्थिक नुकसान और अधिक हो सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर

तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए चिंता का विषय हैं। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ता है, जिससे चालू खाता घाटा (CAD) और महंगाई पर दबाव पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे परिवहन लागत, उत्पादन लागत और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। इससे आम जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा बाजार स्थिति में निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। वैश्विक अनिश्चितताओं, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव के चलते बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।लंबी अवधि के निवेशकों को मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए, जबकि अल्पकालिक निवेशकों को जोखिम प्रबंधन की रणनीति अपनानी चाहिए।

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