नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य पर 20 प्रतिशत टोल लगाने का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रस्ताव फिलहाल वापस ले लिया गया है। इस रूट से दुनिया का करीब एक-तिहाई कच्चा तेल गुजरता है। अगर प्रस्ताव लागू होता तो तेल कंपनियों का ढुलाई खर्च बढ़ जाता।
यहां हम आपको यह बता दें कि, इससे भारत आने वाला कच्चा तेल महंगा हो जाता और देश में डीजल की कीमतें बढ़तीं। भारतीय खेती में डीजल ट्रैक्टर जुताई, सिंचाई और मंडी पहुंचाने के काम में इस्तेमाल होता है। डीजल महंगा होने से किसानों की खेती की लागत बढ़ जाती।खाद क्षेत्र पर भी असर पड़ता। भारत यूरिया, डीएपी आदि खाद और कच्चा माल खाड़ी देशों से आयात करता है। टोल से आयात महंगा होता और सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। इससे बुवाई के मौसम में खाद की किल्लत हो सकती थी या महंगी खाद खरीदनी पड़ती।ट्रंप के फैसले वापस लेने से फिलहाल किसान इस आर्थिक बोझ से बच गए हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के कुल समुद्री कच्चे तेल के व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, इराक और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों से निकलने वाला अधिकांश तेल इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है।
भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क, बाधा या तनाव भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है।
टोल लागू होता तो कैसे बढ़ती तेल की कीमत?
यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पर 20 प्रतिशत टोल लागू कर दिया जाता, तो तेल कंपनियों के लिए जहाजों के संचालन और ढुलाई की लागत बढ़ जाती। अतिरिक्त खर्च का असर अंततः कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता और तेल आयात करने वाले देशों को अधिक भुगतान करना पड़ता।
भारत जैसे बड़े आयातक देश में कच्चे तेल की लागत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बन सकता था। विशेष रूप से डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कृषि क्षेत्र पर सबसे अधिक पड़ता, क्योंकि खेती से जुड़े अधिकांश कार्य सीधे डीजल पर निर्भर हैं।
अंत में चलते चलते बताते चले कि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर 20 प्रतिशत टोल लगाने के प्रस्ताव को फिलहाल वापस लेने से तत्काल किसी अतिरिक्त लागत का खतरा टल गया है। इससे कच्चे तेल की ढुलाई लागत में संभावित बढ़ोतरी नहीं होगी और भारतीय किसानों पर डीजल तथा उर्वरकों के माध्यम से पड़ने वाला अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी फिलहाल टल गया है।
