नई दिल्ली। जिमीकंद यानी सूरन की खेती किसानों के लिए कम लागत और बंपर मुनाफे का बेहतरीन विकल्प साबित हो रही है। पारंपरिक फसलों की तुलना में इस नगदी फसल की खेती से कई किसान हर साल लाखों रुपये का लाभ कमा रहे हैं। बाजार में इसकी मांग साल भर बनी रहती है, जिससे मंदी का सामना नहीं करना पड़ता।
जिमीकंद एक कंद वाली फसल है जिसकी खेती में ज्यादा देखभाल या महंगे कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती। इसके पौधे जमीन के अंदर विकसित होते हैं, इसलिए मौसम की मार और आवारा पशुओं से नुकसान का खतरा भी कम रहता है। बुवाई अच्छे किस्म के कंद के टुकड़ों से की जाती है। खाद और सिंचाई का खर्च सीमित होता है, जिससे एक बीघे या एकड़ में लागत अन्य सब्जियों की तुलना में आधी रह जाती है। गोबर की खाद और जैविक तरीके अपनाकर लागत को और कम किया जा सकता है।
यहां यह जानकारी देते चले कि, देश में बढ़ती महंगाई और खेती की बढ़ती लागत के बीच किसान अब ऐसी फसलों की तलाश में हैं, जिनमें जोखिम कम और मुनाफा अधिक हो। ऐसे में जिमीकंद की खेती किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है। कम लागत, कम देखभाल, लंबे समय तक भंडारण और बाजार में लगातार मांग जैसी खूबियों के कारण आने वाले समय में इसकी खेती का दायरा और बढ़ने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को सही बाजार, तकनीकी जानकारी और सरकारी सहयोग मिले तो जिमीकंद जैसी नगदी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र में नई संभावनाएं भी पैदा होंगी।
