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कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है। ममता बनर्जी की करीबी सहयोगी और बंगाल टीएमसी अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य ने शनिवार को पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। तीन जून को उन्हें राज्य अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मात्र एक महीने के अंदर उन्होंने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को पत्र लिखकर अध्यक्ष पद के साथ-साथ सभी सांगठनिक जिम्मेदारियों से खुद को मुक्त कर लिया। चंद्रिमा भट्टाचार्य ने पार्टी के बैंक खातों से जुड़े अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की भूमिका और चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी से भी अपना नाम वापस ले लिया।

इस इस्तीफे के पीछे उनकी मुख्य वजह उनके पुत्र सौरव बसु का हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले ‘बागी’ गुट में शामिल होना माना जा रहा है। इस्तीफे के बाद पत्रकारों से बात करते हुए चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि उन्हें किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, लेकिन उनके कार्यों और निष्ठा पर उठाए गए सवालों के बाद बने रहना मुश्किल हो गया।उन्होंने स्पष्ट किया कि जब विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में हो, तो उस स्थिति में वापसी का कोई प्रश्न नहीं उठता। ऋतब्रत बनर्जी ने इस घटनाक्रम पर तीखा कटाक्ष करते हुए तृणमूल कांग्रेस को ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ करार दिया है। ममता बनर्जी के खेमे के लिए यह इस्तीफा एक बड़ा संकट माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, चंद्रिमा भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी को पत्र लिखकर न केवल राज्य अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, बल्कि पार्टी के भीतर निभाई जा रही अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से भी स्वयं को मुक्त करने का अनुरोध किया। उन्होंने पार्टी के बैंक खातों से जुड़े अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (ऑथराइज्ड सिग्नेटरी) की भूमिका छोड़ने के साथ-साथ चुनाव आयोग के समक्ष तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी से भी अपना नाम वापस ले लिया।

इस्तीफे के पीछे बताई जा रही वजह

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ी वजह उनके पुत्र सौरव बसु का हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले कथित ‘बागी’ गुट में शामिल होना माना जा रहा है। इस घटनाक्रम के बाद पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और निष्ठा को लेकर सवाल उठने लगे थे।

इस्तीफे के बाद पत्रकारों से बातचीत में चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि उन्हें किसी व्यक्ति से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति की निष्ठा और विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठने लगें, तब उस पद पर बने रहना उचित नहीं रह जाता। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में वापसी का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि विश्वास ही किसी संगठनात्मक जिम्मेदारी का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस इस्तीफे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या चंद्रिमा भट्टाचार्य भविष्य में केवल संगठनात्मक पदों से दूर रहेंगी या उनकी राजनीतिक भूमिका में भी कोई बदलाव देखने को मिलेगा।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उनके इस्तीफे ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में पार्टी की ओर से उठाए जाने वाले कदम और संगठनात्मक नियुक्तियां इस घटनाक्रम की दिशा तय करेंगी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि टीएमसी नेतृत्व के सामने अब संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना और कार्यकर्ताओं का विश्वास मजबूत करना महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

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