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नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को दोबारा लाने की तैयारी में है। अप्रैल के विशेष सत्र में इन बिलों को दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण पास नहीं कराया जा सका था।अप्रैल में सदन में 528 सदस्यों में से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने खिलाफ वोट दिया था। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। लोकसभा में फिलहाल 540 सदस्य हैं, जिसके लिए 360 समर्थन की जरूरत होती है।

अप्रैल से जुलाई के बीच विपक्षी दलों में टूट देखी गई है। टीएमसी के 28 में से 20 लोकसभा सांसद एनडीए के समर्थन में खड़े हैं। टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसदों में से 4 इस्तीफा दे चुके हैं, जिनमें तीन बीजेपी से चुने गए। उद्धव ठाकरे गुट के 9 में से 6 लोकसभा सांसद शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। डीएमके के 22 सांसद कांग्रेस से अलग बैठने के लिए तैयार हैं। शरद पवार की पार्टी के 8 सांसद भी समर्थन के संकेत दे रहे हैं।एनडीए के पास फिलहाल 293 सांसद हैं। विभिन्न दलों के समर्थन से यह संख्या 340 के करीब पहुंच सकती है। सरकार दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के प्रयास में है।

अप्रैल के विशेष सत्र में क्यों नहीं पास हो सके थे बिल?

अप्रैल में आयोजित विशेष संसदीय सत्र के दौरान सरकार ने महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उस समय सदन के 528 सदस्यों में से 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिया

मॉनसून सत्र से पहले बदले राजनीतिक समीकरण

अप्रैल से जुलाई के बीच देश की राजनीति में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। विभिन्न विपक्षी दलों में आंतरिक मतभेद और राजनीतिक पुनर्संरेखण (Political Realignment) की चर्चाएं लगातार होती रही हैं।

उपलब्ध राजनीतिक जानकारी के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लोकसभा सांसदों के एक बड़े वर्ग ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रति समर्थन का रुख अपनाया है। वहीं पार्टी के राज्यसभा सदस्यों में भी बदलाव देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसदों में से चार ने इस्तीफा दिया, जिनमें से तीन बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के समर्थन से चुने गए।

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