नई दिल्ली। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मंगलवार को अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता करेंगे और इसके बाद राज्यपाल को इस्तीफा सौंप सकते हैं। राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार दिल्ली प्रस्थान कर रहे हैं। उनके इस फैसले से बिहार की राजनीति में लंबे समय से चला आ रहा ‘नीतीश युग’ समाप्त होने जा रहा है।
पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार बिहार की सत्ता के धुरी बने रहे। 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने राजनीति को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित रखा। 2025 के विधानसभा चुनावों में एनडीए को प्रचंड जीत मिलने के बाद वे दसवीं बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन अब मात्र चार महीने बाद पद से मोहभंग हो गया है।
नीतीश कुमार के हटते ही बिहार की राजनीति में नया समीकरण बनने की संभावना है। अब तक त्रिकोणीय रही सियासत जेडीयू-बीजेपी-आरजेडी के बीच केंद्रित थी, लेकिन नीतीश के जाने से यह द्विध्रुवीय हो सकती है। बीजेपी अब छोटे भाई की भूमिका से बाहर निकलकर बड़े भाई बनने जा रही है और पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में है।
इस बदलाव के साथ बिहार में सियासी मुकाबला सीधे बीजेपी बनाम आरजेडी का हो सकता है। जेडीयू की जगह बीजेपी केंद्र में आ जाएगी, जबकि विपक्षी खेमे में तेजस्वी यादव सबसे बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं। नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1985 के चुनाव से हुई थी, जब वे पहली बार विधायक बने।बिहार की राजनीति में यह ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय दल की बजाय राष्ट्रीय दल की भूमिका बढ़ने वाली है।
दो दशकों का प्रभावशाली राजनीतिक सफर
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1985 में शुरू हुआ, जब वे पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने बिहार की राजनीति को पूरी तरह अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर लिया। कानून-व्यवस्था में सुधार, सड़क और बुनियादी ढांचे के विकास, तथा सुशासन की छवि के कारण उन्हें लंबे समय तक जनसमर्थन मिलता रहा।
उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में कई बार गठबंधन बदले, लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ बनी रही। 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की प्रचंड जीत के बाद वे दसवीं बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, इस कार्यकाल के महज चार महीने बाद ही उनका इस्तीफा देने का फैसला चौंकाने वाला माना जा रहा है।
बदलते समीकरण और नई सियासत
नीतीश कुमार के हटने के साथ ही बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। अब तक राज्य की सियासत तीन प्रमुख दलों—जेडीयू, भाजपा और आरजेडी—के बीच त्रिकोणीय रही है। लेकिन अब यह समीकरण बदलकर द्विध्रुवीय हो सकता है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जो अब तक गठबंधन में ‘छोटे भाई’ की भूमिका निभाती रही, अब ‘बड़े भाई’ के रूप में उभरने की तैयारी में है। पार्टी पहली बार बिहार में अपने मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार चलाने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। यह बदलाव राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, विपक्ष में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की भूमिका भी मजबूत होती नजर आ रही है। पार्टी के युवा नेता तेजस्वी यादव अब विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभर सकते हैं।
नीतीश कुमार का इस्तीफा बिहार की राजनीति में एक युग के अंत का संकेत है। उनके नेतृत्व में राज्य ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन अब एक नई शुरुआत होने जा रही है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह बदलाव बिहार के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को किस दिशा में ले जाता है।
