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नई दिल्ली। आजकल किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती से भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इन्हीं में शामिल है पत्थरचट्टा, जिसे कलांचो पिन्नाटा या ब्रायोफिलम के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधा न केवल खूबसूरत दिखता है बल्कि स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी है। आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण इसकी खेती किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है।

पत्थरचट्टा की खेती शुरू करना बेहद आसान है। इसके लिए बीज की जरूरत नहीं पड़ती। एक पौधा नर्सरी या ऑनलाइन से खरीदकर उसके पत्तों से नई खेती बढ़ाई जा सकती है। इसकी खेती के लिए नम मिट्टी उपयुक्त होती है। अच्छी पोटिंग मिक्स में 60 प्रतिशत दोमट मिट्टी, 20 प्रतिशत कोको पीट और 20 प्रतिशत रेत का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधों को सही पोषण मिलता है।

इस पौधे की देखभाल भी सरल है। इसे रोजाना कम से कम 4 से 5 घंटे सीधी धूप चाहिए। यह गर्मी सहन कर सकता है लेकिन पाले को बर्दाश्त नहीं कर पाता। ठंड के मौसम में इसे घर के अंदर रखना बेहतर होता है। तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे होने पर यह हानिकारक प्रभावित हो सकता है। गर्मियों में जब मिट्टी 2-3 इंच गहरी सूख जाए तब ही पानी देना चाहिए।पत्थरचट्टा की मांग मुख्य रूप से आयुर्वेदिक दवाओं, हर्बल उत्पादों और नर्सरी व्यवसाय में है। एक पौधा आसानी से 30 से 50 रुपये में बिक सकता है। इस खेती में कम श्रम और कम रोग लगने के कारण इसे आय बढ़ाने का बेहतरीन विकल्प माना जाता है।

कैसी होनी चाहिए मिट्टी?

पत्थरचट्टा की अच्छी वृद्धि के लिए जल निकासी वाली नम मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार बेहतर परिणाम के लिए निम्न मिश्रण उपयोगी माना जाता है—

  • 60 प्रतिशत दोमट मिट्टी
  • 20 प्रतिशत कोको पीट
  • 20 प्रतिशत साफ रेत

यह मिश्रण पौधों की जड़ों तक पर्याप्त हवा और नमी पहुंचाने में मदद करता है। साथ ही अतिरिक्त पानी आसानी से निकल जाता है, जिससे जड़ सड़ने की संभावना कम रहती है।

यदि खेती बड़े स्तर पर की जा रही हो तो खेत की मिट्टी की जांच कराकर उसमें आवश्यक जैविक खाद और पोषक तत्व मिलाना भी लाभदायक हो सकता है।

कम लागत, बेहतर मुनाफे की संभावना

पत्थरचट्टा की खेती में शुरुआती निवेश अपेक्षाकृत कम होता है। बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और एक बार पौधा तैयार होने के बाद उससे लगातार नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं। देखभाल पर भी अधिक खर्च नहीं आता।

यदि किसान स्थानीय नर्सरी, हर्बल उत्पाद निर्माताओं, औषधीय पौधों के विक्रेताओं या ऑनलाइन पौधा बिक्री प्लेटफॉर्म से जुड़ते हैं, तो उन्हें बेहतर बाजार मिल सकता है। हालांकि आय कई कारकों जैसे उत्पादन, गुणवत्ता, मांग, विपणन और स्थानीय बाजार की कीमतों पर निर्भर करती है।

पत्थरचट्टा की खेती कम लागत, आसान रखरखाव और औषधीय पौधों की बढ़ती मांग के कारण किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनकर उभर रही है। इसकी खेती बीज के बजाय पत्तियों से आसानी से की जा सकती है और इसे फार्म हाउस, नर्सरी या छोटे व्यावसायिक स्तर पर भी अपनाया जा सकता है। यदि किसान वैज्ञानिक सलाह, स्थानीय बाजार की मांग और उचित कृषि प्रबंधन को ध्यान में रखकर इसकी खेती करें, तो यह उनकी आय बढ़ाने में सहायक साबित हो सकती है। हालांकि किसी भी व्यावसायिक खेती की शुरुआत से पहले विशेषज्ञों से परामर्श और बाजार का आकलन करना आवश्यक है।

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