नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में धान की फसल पर बौनेपन की समस्या तेजी से फैल रही है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। प्रभावित पौधे छोटे, गुच्छेदार और गहरे हरे रंग के दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों ने समय रहते रोकथाम न करने पर पैदावार में भारी गिरावट की आशंका जताई है।किसान सलाहकार चंद्रभूषण पांडे के अनुसार धान में बौनापन मुख्य रूप से रसचूसक कीटों, खासकर वाइट बैक्ड प्लांट हॉपर (फुदका) के फैलाए जाने वाले वायरस के कारण होता है। यह कीट संक्रमित पौधों का रस चूसकर स्वस्थ पौधों में वायरस पहुंचा देता है, जिससे पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। समस्या के पीछे साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस और जिंक की कमी प्रमुख कारण हैं। इसके अतिरिक्त जलभराव, जड़ों का कमजोर विकास और यूरिया का असंतुलित उपयोग भी पौधों की वृद्धि को रोक देता है, जिससे तना छोटा और सख्त रह जाता है।
यहां हम आपको बताते चले कि, प्रभावित पौधे दूर से ही छोटे और झुंड में नजर आते हैं। उनकी पत्तियां सामान्य से अधिक गहरी हरी, मोटी और कई बार मुड़ी हुई होती हैं। ऐसे पौधों में बालियां या तो निकलती ही नहीं हैं और अगर निकलती भी हैं तो वे खाली और खोखली रह जाती हैं, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।किसान सलाहकार अवनीश पटेल ने बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले रसचूसक कीटों का नियंत्रण जरूरी है। इसके लिए ट्राइफ्लुमेज़ोपाइरिम, पाइमेट्रोज़िन या इमिडाक्लोप्रिड जैसी दवाओं का छिड़काव विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए। जिंक की कमी को दूर करने के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 1 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़काव करना लाभकारी रहेगा। विशेषज्ञों ने किसानों को घबराकर अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग न करने, खेत में पानी का ठहराव न होने देने और जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करने की सलाह दी है। शुरुआत से ही रोग-प्रतिरोधी बीजों का चयन करने और बीजोपचार करने की भी सलाह दी गई है।
छोटे और गुच्छेदार पौधे दिखें तो रहें सतर्क
धान में बौनेपन की समस्या को खेत में पौधों की बनावट देखकर काफी हद तक पहचाना जा सकता है। प्रभावित पौधे सामान्य धान की तुलना में छोटे रह जाते हैं और कई बार एक जगह पर गुच्छे की तरह दिखाई देते हैं। इन पौधों की पत्तियां सामान्य से अधिक गहरे हरे रंग की, मोटी और कुछ मामलों में मुड़ी हुई नजर आती हैं।
किसान सलाहकार चंद्रभूषण पांडे के अनुसार धान में बौनेपन के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें रसचूसक कीटों, विशेष रूप से वाइट बैक्ड प्लांट हॉपर यानी फुदका से फैलने वाले वायरस को प्रमुख कारणों में माना जाता है। संक्रमित पौधे से रस चूसने के बाद यह कीट जब स्वस्थ पौधे पर पहुंचता है तो संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ जाती है। यही वजह है कि खेत में कुछ पौधों में लक्षण दिखाई देने पर किसानों को आसपास की फसल का भी निरीक्षण करना चाहिए।
जलभराव और यूरिया का असंतुलित इस्तेमाल भी नुकसानदेह
धान की फसल को पानी की जरूरत होती है, लेकिन लंबे समय तक खेत में अत्यधिक जलभराव पौधों की जड़ों के विकास को प्रभावित कर सकता है। कमजोर जड़ प्रणाली के कारण पौधों को पोषक तत्वों का पर्याप्त उपयोग करने में परेशानी हो सकती है। इससे पौधों की वृद्धि रुकने जैसी स्थिति बन सकती है।
इसी तरह यूरिया का संतुलित उपयोग भी बेहद जरूरी है। अधिक मात्रा में या बिना जरूरत यूरिया डालने से फसल को अपेक्षित लाभ मिलने के बजाय पोषण संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए किसानों को केवल पौधे कमजोर दिखने पर बार-बार यूरिया डालने से बचना चाहिए और मिट्टी की स्थिति तथा कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार पोषक तत्वों का प्रबंधन करना चाहिए।
धान में बौनापन दिखाई देने पर घबराने के बजाय पहले उसके संभावित कारण की पहचान करना जरूरी है। क्योंकि वायरस, रसचूसक कीट, जिंक की कमी, जलभराव और पोषण असंतुलन के लक्षण कई बार एक-दूसरे से मिलते-जुलते दिखाई दे सकते हैं। गलत कारण मानकर दवा या खाद का इस्तेमाल करने से लागत बढ़ सकती है और समस्या का समाधान भी नहीं हो सकता।
