नई दिल्ली। केसर दुनिया के सबसे महंगे मसालों में से एक माना जाता है। इसके खाने में डालने से खाने का रंग, खुशबू और स्वाद तीनों बढ़ जाते हैं। वैसे तो केसर को भारत के कश्मीर से खासतौर पर जोड़ा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसे भारत के अन्य राज्यों में भी उगाने का सफल प्रयास किया गया है। केसर की खेती जितनी आकर्षक लगती है, उससे कई ज्यादा चुनौतीपूर्ण भी होती है। यही वजह है कि इसके दाम ज्यादा होते हैं और इसकी खेती सीमित मात्रा में होती है।
भारत में मुख्य रूप से केसर की पारंपरिक खेती कश्मीर में की जाती है। कश्मीर का ठंडा वातावरण और यहां की जलवायु केसर की खेती के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है। केसर की खेती के लिए खासकर पुलवामा जिले के पंपोर और आसपास के क्षेत्र जैसे बडगाम और श्रीनगर काफी मशहूर माने जाते हैं। पंपोर को तो केसर का कटोरा भी कहा जाता है। वहीं पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों ने भी केसर उगाने के सफल प्रयास किए हैं।
इस कड़ी में जानकारी देते चले कि, आमतौर पर केसर की खेती अगस्त के महीने में की जाती है। इसमें फूल लगने की शुरुआत अक्टूबर के आखिरी हफ्ते या नवंबर के पहले हफ्ते में हो जाती है। जब ये फूल तैयार हो जाते हैं तो ये बेहद खूबसूरत बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं, जिसके अंदर लाल या केसरिया रंग के पतले-पतले रेशे होते हैं। उन्हीं रेशों को चुनकर सुखाया जाता है और वे केसर के रूप में तैयार हो जाते हैं। हर एक फूल से केवल तीन केसर के रेशे ही निकलते हैं। यही वजह है कि केसर का उत्पादन कम होता है और यह इतना महंगा होता है। कहा जाता है कि एक ग्राम केसर के लिए 150 से 200 फूलों की आवश्यकता होती है।
अंत मे बताते चले कि, केसर की खेती मुश्किल होने का कारण उसकी जलवायु और मिट्टी है। केसर के फूलों के लिए ठंडा मौसम और उपयुक्त वातावरण चाहिए होता है। इसके लिए ऐसी जमीन की आवश्यकता होती है जिसकी जल निकासी बेहतर हो। ज्यादा नमी होने से इसके कंद सड़ सकते हैं, जिससे पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। वहीं केसर की कटाई आम फसल जैसे नहीं की जा सकती। इसे आमतौर पर सुबह-सुबह हाथों से तोड़ा जाता है और बड़ी ही सावधानी से सुखाया जाता है। इसमें अधिक समय और श्रम लगता है। इसके अलावा मौसम में बदलाव होने से भी फसल खराब होने का डर रहता है।
