अयोध्या। अयोध्या में राम मंदिर में हुई दान चोरी के मामले में अब तक पुलिस ने छह कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। हालांकि ट्रस्ट का कोई सदस्य गिरफ्तार नहीं हुआ है। इस घटना को कुछ लोग मंदिर निर्माण के लिए एकत्रित किए गए पैसे से जोड़ रहे हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह पूरी तरह गलत है। दान चोरी का मामला और मंदिर निर्माण के लिए जुटाई गई रकम का मामला एक-दूसरे से अलग है। इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदारी मुख्य रूप से बैंक की बताई जा रही है।
दान की गणना के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के बीच समझौता था। इस समझौते के तहत मंदिर प्रशासन का काम दानपात्र की पेटियों को बैंक के कर्मचारियों को सौंपना और गिनती के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराना था। पैसों की गिनती, कर्मचारियों की नियुक्ति, उनका भुगतान, काम करने का तरीका तय करना और नोट गिनने वाली मशीनों की व्यवस्था बैंक की जिम्मेदारी थी। एसबीआई ने इस काम के लिए सैनिक सुरक्षा समिति नाम की एजेंसी की मदद ली थी। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि बैंक और इस एजेंसी के बीच हुए समझौते में ट्रस्ट स्वयं पक्ष नहीं था। कथित चोरी मशीन में नोट गिने जाने से पहले होती थी। दान पेटी खुलने के बाद जब कर्मचारी नोटों का बंडल बनाते और उन्हें व्यवस्थित करते थे, उसी दौरान पैसे निकाल लिए जाते थे।
गौरतलब हैं कि, मंदिर में रखी दान पेटियों से नकदी निकालने के बाद उन्हें सीधे गिनती वाले कमरे में नहीं ले जाया जाता था। हर हुंडी पर दो ताले लगाए जाते थे। इनमें एक चाबी बैंक के पास और दूसरी मंदिर प्रबंधन के पास रहती थी, ताकि रास्ते में किसी एक व्यक्ति के लिए दानपात्र खोलना संभव न हो। हुंडियों को मंदिर से तय जगह तक बैंक अधिकारियों की मौजूदगी में ले जाया जाता था। गिनती मंदिर परिसर के बाहर बने पब्लिक फैसिलिटी सेंटर यानी पीएफसी में की जाती थी। इस जगह को बैंक अधिकारियों से बातचीत के बाद तय किया गया था। गिनती केंद्र की निगरानी मंदिर प्रबंधन, बैंक और पुलिस की साझा जिम्मेदारी में थी, लेकिन नकदी गिनने का मुख्य काम बैंक का था।
आखिर में बता दें कि, घटना के बाद व्यवस्था में कई बदलाव किए गए हैं। कर्मचारियों के लिए ऐसी ड्रेस की व्यवस्था की गई है जिसमें जेब नहीं है। सीसीटीवी कैमरों को बेहतर बनाया गया है और उनकी रिकॉर्डिंग लंबे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है। गिनती के काम में बार-बार नए ठेका कर्मचारियों की जगह नियमित कर्मचारियों को लगाने पर जोर दिया जा रहा है। ट्रस्ट के अनुसार कुल चढ़ावे का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा हुंडियों के जरिए नकद आता है। वहीं मंदिर निर्माण के लिए जुटाई गई करीब 3300 करोड़ रुपये की रकम से इस चोरी का कोई सीधा संबंध सामने नहीं आया है। ट्रस्ट का कहना है कि इस पूरी रकम का ऑडिट कराया गया है, जिसमें करीब 400 करोड़ रुपये जमीन खरीदने और लगभग 1800 करोड़ रुपये मंदिर निर्माण पर खर्च होने की जानकारी दी गई है।
दान चोरी और मंदिर निर्माण की रकम अलग-अलग मामले
राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे का एक बड़ा हिस्सा दानपात्र यानी हुंडियों के माध्यम से नकद प्राप्त होता है। ट्रस्ट के अनुसार कुल चढ़ावे का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा हुंडियों के जरिए नकद आता है। इसी नकदी की गिनती और उसे बैंकिंग प्रणाली में जमा करने के लिए मंदिर प्रशासन और भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई के बीच व्यवस्था तय की गई थी।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि दानपात्र से कथित तौर पर चोरी हुई रकम को मंदिर निर्माण के लिए जुटाई गई राशि से सीधे जोड़ना उचित नहीं है। मंदिर निर्माण के लिए देशभर से जुटाई गई धनराशि और मंदिर में नियमित रूप से आने वाले चढ़ावे की नकदी अलग-अलग वित्तीय मदों से संबंधित हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 3300 करोड़ रुपये की मंदिर निर्माण संबंधी राशि का ऑडिट भी कराया गया है।
फिलहाल पुलिस की जांच और गिरफ्तार कर्मचारियों से पूछताछ के आधार पर मामले की पूरी तस्वीर सामने आने का इंतजार है। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कथित चोरी में कुल कितनी रकम का नुकसान हुआ और इस प्रक्रिया में अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं। वहीं मंदिर निर्माण के लिए जुटाई गई करीब 3300 करोड़ रुपये की राशि को लेकर ट्रस्ट द्वारा कराए गए ऑडिट और दानपात्र की कथित चोरी को अलग-अलग विषय के रूप में देखना जरूरी है। इससे अफवाहों और तथ्यात्मक जानकारी के बीच अंतर स्पष्ट रखने में मदद मिलेगी।
