नई दिल्ली। भेड़ पालना सिर्फ मांस या दूध का व्यवसाय नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाली ऊन भी किसानों के लिए कमाई का जरिया बन सकती है। खासकर सर्दियों के मौसम में ऊन की मांग तेजी से बढ़ जाती है। भेड़ पालन में ऊन से हर भेड़ पर 13 से 100 रुपये तक की कमाई हो सकती है, जो इलाके के हिसाब से अलग-अलग होती है।
हम आपको बता दें कि, गुजरात के कच्छ इलाके में देशी पाटनवाड़ी नस्ल पालने वाले मालधारियों के मुताबिक ऊन काटने वाले कारीगरों को हर भेड़ पर औसतन 13 से 15 रुपये मिलते हैं। वहीं राजस्थान के जोधपुर में एक गैर-लाभकारी संगठन की मदद से मशीन से ऊन निकालने वाले भेड़ पालकों को प्रति भेड़ 50 से 100 रुपये तक की कीमत मिलने लगी है।
यहां हम आपको यह भी बताते चले कि सिर्फ ऊन ही नहीं, भेड़ को सीधे मंडी में बेचने पर भी कमाई होती है। मंडी भाव के मुताबिक भेड़ का औसत दाम करीब 120 रुपये प्रति किलोग्राम रहता है, जबकि प्रति क्विंटल भाव 8,000 से 15,000 रुपये के बीच रहता है। एक भेड़ की औसत बाजार कीमत 6,000 से 10,000 रुपये के आसपास होती है।
जानकारी दे दें कि, अगर कोई किसान 15 मादा भेड़ों के साथ व्यवसाय शुरू करता है तो अच्छी देखभाल की स्थिति में एक साल के भीतर झुंड की संख्या करीब 50 तक पहुंच सकती है, क्योंकि एक भेड़ साल में दो बार प्रजनन करती है और हर बार दो बच्चों को जन्म दे सकती है। इससे किसान सारे खर्चे निकालने के बाद लाखों रुपये तक की कमाई कर सकते हैं।
जानकारी के लिए बता दें कि, भेड़ पालन से ऊन के अलावा दूध, मांस, चमड़ा और जैविक खाद बेचकर भी कमाई की जा सकती है। बिहार के सुपौल जिले के एक किसान के मुताबिक भेड़ों से मिलने वाली जैविक खाद 8 से 10 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकती है, जिससे रोजाना 350 से 500 रुपये तक की कमाई हो जाती है। सिर्फ जैविक खाद से महीने में 10,000 से 15,000 रुपये तक की आमदनी हो सकती है। इसमें ऊन, भेड़ बिक्री और अन्य उत्पादों से होने वाली कमाई जोड़ दी जाए तो झुंड के आकार के हिसाब से महीने की कुल आमदनी कई गुना बढ़ सकती है।
कच्छ में पाटनवाड़ी भेड़ों की ऊन से कितनी कमाई?
गुजरात के कच्छ इलाके में देशी पाटनवाड़ी नस्ल की भेड़ पालने वाले मालधारियों के अनुसार, यहां ऊन निकालने वाले कारीगरों को एक भेड़ की ऊन काटने के लिए औसतन 13 से 15 रुपये मिलते हैं। यह राशि मुख्य रूप से ऊन काटने की सेवा से जुड़ी है। वास्तविक आर्थिक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान को ऊन बेचने पर कितनी कीमत मिलती है और भेड़ से कितनी मात्रा में उपयोगी ऊन प्राप्त होती है।
कच्छ जैसे क्षेत्रों में भेड़ पालन लंबे समय से ग्रामीण और पशुपालक समुदाय की आजीविका का हिस्सा रहा है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नस्ल का चयन और पशुओं की देखभाल करने से किसान अपने पशुपालन व्यवसाय को बेहतर तरीके से चला सकते हैं।
भेड़ बेचकर भी होती है अच्छी कमाई
भेड़ पालन में किसान की आय सिर्फ ऊन पर निर्भर नहीं रहती। जरूरत पड़ने पर भेड़ों को बाजार या मंडी में बेचकर भी आमदनी हासिल की जा सकती है। उपलब्ध मंडी भाव के अनुसार भेड़ का औसत दाम करीब 120 रुपये प्रति किलोग्राम बताया गया है, जबकि प्रति क्विंटल कीमत लगभग 8,000 से 15,000 रुपये के बीच हो सकती है। एक भेड़ की औसत बाजार कीमत करीब 6,000 से 10,000 रुपये के आसपास बताई गई है।
हालांकि, वास्तविक बिक्री मूल्य भेड़ के वजन, उम्र, नस्ल, स्वास्थ्य, बाजार की मांग और स्थानीय मंडी के भाव के अनुसार काफी बदल सकता है। इसलिए किसानों को पशु खरीदने या बेचने से पहले अपने क्षेत्र के मौजूदा बाजार भाव की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
आखिर में बताते चले कि, इस तरह भेड़ पालन को केवल ऊन या मांस बेचने तक सीमित न रखकर किसान ऊन, पशु बिक्री, खाद और अन्य उपलब्ध उत्पादों के जरिए अपनी आय के अलग-अलग स्रोत विकसित कर सकते हैं। स्थानीय बाजार, पशु चिकित्सा सुविधाओं और उपलब्ध संसाधनों की जानकारी लेकर योजनाबद्ध तरीके से शुरू किया गया भेड़ पालन ग्रामीण परिवारों के लिए लंबे समय तक आय और आजीविका का साधन बन सकता है।
