नई दिल्ली। पारंपरिक फसलों की तुलना में स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो रही है। पहले इसे केवल ठंडे पहाड़ी इलाकों में उगाने योग्य माना जाता था, लेकिन अब बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे मैदानी राज्यों के किसान भी इसकी सफल खेती कर रहे हैं। बेकरी उद्योग, आइसक्रीम ब्रांड्स और सुपरमार्केट्स में इसकी बढ़ती मांग तथा ऊंचे दामों ने इसे आकर्षक व्यवसाय बना दिया है। इसकी फसल मात्र चार से पांच महीने में तैयार हो जाती है।
एक एकड़ में स्ट्रॉबेरी लगाने का उपयुक्त समय सितंबर से अक्टूबर है। इसके लिए लगभग 22,000 से 24,000 पौधों की आवश्यकता होती है। पौधे हिमाचल, पुणे और स्थानीय नर्सरी से उपलब्ध हैं, जिनकी औसत कीमत 10 से 12 रुपये प्रति पौधा है। पौधों पर करीब 2.5 लाख रुपये खर्च आता है। खेत की गहरी जुताई, गोबर की सड़ी खाद, ड्रिप इरिगेशन सिस्टम और ब्लैक मल्चिंग शीट पर लगभग एक से 1.25 लाख रुपये लगते हैं। खाद, कीटनाशक और मजदूरी सहित कुल शुरुआती लागत 3.5 से चार लाख रुपये बैठती है। ड्रिप और मल्चिंग पर सरकारी सब्सिडी मिलने पर यह लागत और कम हो सकती है।
एक स्वस्थ पौधा पूरे सीजन में औसतन 500 से 700 ग्राम फल देता है। इस आधार पर 22,000 पौधों से एक एकड़ में लगभग 110 से 130 क्विंटल पैदावार होती है। सीजन की शुरुआत में स्ट्रॉबेरी 300 से 400 रुपये प्रति किलो बिकती है, जबकि पीक सीजन में 150 से 200 रुपये प्रति किलो के बीच। औसत थोक भाव 150 रुपये प्रति किलो मानने पर 120 क्विंटल फसल से कुल बिक्री करीब 18 लाख रुपये होती है। चार लाख रुपये की लागत तथा पैकिंग व परिवहन खर्च निकालने के बाद किसान को चार से पांच महीने में 12 से 14 लाख रुपये का मुनाफा बचता है।
फसल समाप्त होने पर पौधों से रनर्स निकलते हैं। एक एकड़ से 40,000 से 50,000 नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं। इन्हें आठ से 10 रुपये प्रति पौधे की दर से बेचकर तीन से चार लाख रुपये की अतिरिक्त आय हो सकती है। फलों को बिचौलियों के बजाय स्थानीय बाजारों, जूस कॉर्नर्स, बेकरियों और फल विक्रेताओं को सीधे छोटे पैकेटों में बेचने से मुनाफा मार्जिन 20 से 30 प्रतिशत और बढ़ जाता है।
